वो आख़िरी ख़त

गाँव की मिट्टी
गाँव का नाम था रामपुर, जहाँ ज़िंदगी की रफ़्तार शहरों की तरह तेज़ नहीं थी, पर सुकून बहुत था। वहाँ का हर इंसान एक-दूसरे को जानता था। वहीं रहता था राजू, एक साधारण किसान का बेटा, जिसकी आँखों में बड़े-बड़े सपने थे। पढ़ाई में होशियार, स्वभाव से शांत, और दिल का सच्चा।

राजू का सपना था – आर्मी में जाना, देश की सेवा करना। लेकिन उसके पिता रामलाल जी चाहते थे कि बेटा खेत सँभाले, क्योंकि अब उम्र उनकी ज़्यादा हो चली थी। माँ शांतिबाई हमेशा बेटे की हिम्मत बढ़ाती थीं – “जा बेटा, तू जा फौज में, देश की सेवा सबसे बड़ा धर्म है।”

संघर्ष और सफ़लता
राजू ने घर-गाँव छोड़कर शहर की ओर रुख़ किया। कोचिंग की फीस भरने के लिए अख़बार बाँटता, होटलों में काम करता, और रात को पढ़ता। दिन-रात की मेहनत रंग लाई और आखिरकार, उसे भारतीय सेना में चयन मिल गया।

गाँव में ढोल-नगाड़े बजे। पूरे गाँव ने गर्व से कहा – “देखो, रामलाल का बेटा फ़ौजी बन गया!”

राजू ने पहले पोस्टिंग के बाद गाँव एक चिट्ठी भेजी। उसमें लिखा –
“माँ, मैंने वादा निभा दिया। अब मेरा जीवन देश के नाम।”

सरहद की पुकार
कई साल बीत गए। राजू अब एक ईमानदार और बहादुर सैनिक बन चुका था। 2020 में उसकी पोस्टिंग LOC (लाइन ऑफ कंट्रोल) पर हुई। तभी सीमा पार से बढ़ते तनाव के चलते एक रात अचानक भारी गोलाबारी शुरू हो गई।

राजू ने अपने जवानों के साथ मोर्चा संभाला। उसने साथियों की जान बचाई, दुश्मन को पीछे हटाया, लेकिन खुद… एक गोली उसके सीने को चीर गई।

उसने धरती पर गिरते हुए एक आख़िरी ख़त जेब से निकाला –
“माँ, अगर मैं लौटूँ तो तिरंगे में लिपटा आऊँगा। ये मेरा वादा है।”

तिरंगा और आँसू
गाँव के हर कोने में सन्नाटा था। जब तिरंगे में लिपटा राजू का पार्थिव शरीर गाँव पहुँचा, तो हर आँख नम थी। माँ के आँचल में बेटे की चिट्ठी थी।

राजू को शहीद का दर्जा मिला। सरकार से पैसे मिले, लेकिन माँ ने सब गाँव के स्कूल को दान कर दिया। उन्होंने कहा –
“मेरा बेटा मरकर भी अमर हो गया। अब हर बच्चा राजू बने, यही उसकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।”

प्रेरणा

आज राजू मेमोरियल स्कूल गाँव में सबसे ऊँचा स्कूल है। उसकी दीवारों पर लिखा है:
“जो मिटता है वतन के लिए, वो कभी नहीं मरता।”

बच्चे जब-जब तिरंगे को सलामी देते हैं, कहीं न कहीं राजू की रूह मुस्कुरा उठती है।

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