पहली नज़र का प्यार
इलाहाबाद का वह छोटा-सा कॉलेज, जहाँ हर गलियारा कहानियों से भरा था। वहीं की छात्रा थी रागिनी — शांत स्वभाव, बड़ी-बड़ी आँखों में अनगिनत सपने और दिल में कुछ कर दिखाने की चाह। वह एक साधारण परिवार से थी, पर उसकी सोच और आत्मविश्वास उसे भीड़ से अलग बनाते थे।
एक दिन लाइब्रेरी में किताबों के बीच उलझते हुए उसकी मुलाकात हुई आदित्य से — कॉलेज का सबसे चर्चित लड़का। ऊँचा कद, हल्की दाढ़ी, और बोलने में एक अजीब आकर्षण। वो किसी को भी अपनी बातों से मोह सकता था। जब दोनों की नज़रें मिलीं, एक पल को जैसे वक़्त थम गया। रागिनी का दिल हल्का-सा धड़का, और आदित्य मुस्कुरा उठा।
“क्या मैं ये किताब ले लूँ?” आदित्य ने पूछा।
“जी… हाँ…” रागिनी थोड़ा झिझकी।
वो पल जैसे किसी अधूरी कविता की पहली पंक्ति थी।

दोस्ती की शुरुआत
धीरे-धीरे रागिनी और आदित्य की मुलाकातें बढ़ने लगीं। कभी कैंटीन की चाय पर चर्चा, तो कभी लाइब्रेरी में लंबी बातें। आदित्य को रागिनी की सादगी भा गई, और रागिनी को आदित्य का खुले दिल से जीना पसंद आया।
पर इस कहानी में तीसरा किरदार भी था — करण।
करण, रागिनी का बचपन का दोस्त, उसका हमराज़। वो दिल्ली से इलाहाबाद सिर्फ इसी लिए आया था कि रागिनी के पास रह सके, उसके सपनों में उसका साथ दे सके। करण के लिए रागिनी सिर्फ एक दोस्त नहीं, उसकी दुनिया थी — पर रागिनी अब आदित्य के करीब हो रही थी।
करण हर दिन अपनी भावनाओं को छुपा कर मुस्कुराता, लेकिन उसकी आँखों में जलन साफ़ झलकती।

प्यार का इज़हार
एक शाम, कॉलेज का वार्षिकोत्सव था। सजे हुए रंगमंच पर आदित्य और रागिनी ने मिलकर एक नाटक किया। सबने उनकी केमिस्ट्री की तारीफ की। उसी रात, जब चाँद आसमान पर मुस्कुरा रहा था, आदित्य ने रागिनी को कॉलेज के बागीचे में बुलाया।
“रागिनी,” उसने कहा, “मैंने तुम्हारे साथ बिताए हर पल में खुद को बेहतर पाया है। क्या तुम… क्या तुम मुझसे प्यार करती हो?”
रागिनी कुछ पलों तक चुप रही, फिर धीमे से बोली, “हाँ, आदित्य।”
दूर से करण ये सब देख रहा था। उसका दिल जैसे टूट कर बिखर गया।

उलझते रिश्ते
प्यार का ये रिश्ता कुछ महीनों तक खूबसूरत रहा, लेकिन करण की मौजूदगी धीरे-धीरे आदित्य को खटकने लगी। उसे लगता कि रागिनी अब भी करण के लिए कुछ महसूस करती है। वहीं करण ने खुद को पूरी तरह बदल लिया — अब वो अकेला नहीं बैठता, कॉलेज की राजनीति में उतर आया, और रागिनी से दूरी बनानी शुरू कर दी।
रागिनी को ये बदलाव अजीब लगा। उसने एक दिन करण से पूछा, “तुम मुझसे दूर क्यों जा रहे हो?”
करण ने मुस्कुरा कर कहा, “कभी-कभी पास रहकर भी दूर हो जाना बेहतर होता है।”
रागिनी समझ तो गई, पर कह नहीं पाई।

सच का सामना
एक दिन आदित्य ने करण को रागिनी की पुरानी डायरी पढ़ते हुए देख लिया। उसे लगा करण अब भी रागिनी से प्यार करता है और उसकी निजी बातों में दखल दे रहा है। दोनों के बीच झगड़ा हुआ।
“तू कभी उसका नहीं हो सकता!” आदित्य चिल्लाया।
“कम से कम मैं उसकी भावनाओं का मज़ाक तो नहीं बनाता!” करण ने जवाब दिया।
रागिनी बीच में आई, लेकिन तब तक बहुत कुछ बिगड़ चुका था। वो खुद उलझ गई थी। एक तरफ आदित्य का मोहक प्रेम, दूसरी तरफ करण की बिन बोले निभाई दोस्ती।

फैसला
समय बीतता गया। रागिनी ने एक दिन दोनों को पास बुलाया और कहा:
“मैंने बहुत सोचा। प्यार एक एहसास है, लेकिन विश्वास… वो आधार है। आदित्य, तुमने मुझे बहुत प्यार दिया, पर शक की दीवारें हमारे बीच खड़ी कर दीं। और करण… तुमने कभी मुझसे कुछ मांगा नहीं, लेकिन सब कुछ दिया।”
वो थोड़ी देर रुकी और फिर बोली:
“मैं किसी के साथ नहीं रहूँगी। मैं खुद को समझना चाहती हूँ। मेरे सपने, मेरी पहचान — वो ज़रूरी है। मैं अब दिल्ली जा रही हूँ, उच्च शिक्षा के लिए।”
दोनों चुप हो गए।

कुछ साल बाद…
तीन साल बाद दिल्ली की एक साहित्यिक सभा में रागिनी बतौर लेखिका मंच पर खड़ी थी। उसकी किताब “तीन रास्ते, एक दिल” बेस्टसेलर बन चुकी थी।
सभा ख़त्म होने के बाद एक हाथ ने उसके कंधे पर हल्की दस्तक दी। वो मुड़ी — करण था, हाथ में वही पुरानी डायरी।
“अब तो इस पर तुम कुछ लिखो,” करण मुस्कुराया।
दूसरी तरफ आदित्य भी खड़ा था, फूलों का गुलदस्ता लिए।
तीनों मुस्कराए। कुछ अधूरे रिश्ते वक़्त के साथ दोस्ती में बदल जाते हैं।

अंत
कुछ कहानियाँ अधूरी रहकर भी पूरी हो जाती हैं। क्योंकि ज़रूरी नहीं कि हर प्यार को नाम मिले — कभी-कभी वो सिर्फ दिल में एक मुक्कमल एहसास बनकर रह जाता है।