“सच्चाई का इनाम”

कहानी का संदेश: सच्चाई, ईमानदारी और साहस का महत्व

गांव नंदपुर में एक छोटा-सा लड़का अर्जुन अपने माता-पिता के साथ रहता था। वह पांचवीं कक्षा में पढ़ता था और पढ़ाई में बहुत होशियार था। लेकिन जो चीज़ उसे सबसे खास बनाती थी, वो थी उसकी ईमानदारी और सच्चाई के लिए उसकी निष्ठा।

अर्जुन का सपना था कि वह बड़ा होकर शिक्षक बने, ताकि वह अपने जैसे गांव के बच्चों को पढ़ा सके। उसका स्कूल गांव से दो किलोमीटर दूर था, और वह हर दिन पैदल चलकर जाता था। रास्ते में एक पुराना आम का पेड़ पड़ता था, जहां बच्चे अक्सर खेलते या आराम करते थे।

एक दिन की बात है। अर्जुन स्कूल से लौट रहा था। रास्ते में उसे आम के पेड़ के नीचे कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया। उसने पास जाकर देखा तो वह एक भारी थैला था। जब उसने उसे खोला, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं—थैले में नोटों की गड्डियाँ थीं! वह घबरा गया।

“इतना सारा पैसा… ये किसका हो सकता है?” उसने सोचा।

कुछ देर सोचने के बाद उसने थैला उठाया और सीधा गांव के प्रधानजी के घर की ओर चल पड़ा।

प्रधानजी ने थैला खोला और चौंक गए। “ये तो रामू काका का पैसा है! उन्होंने अपनी फसल बेचकर बैंक से निकाला था। शायद रास्ते में गिर गया होगा।”

फिर उन्होंने अर्जुन की पीठ थपथपाई, “बेटा, तुमने सच्चाई और ईमानदारी की मिसाल कायम की है। कोई और होता तो ये पैसा रख लेता।”

गांव में यह खबर आग की तरह फैल गई। सभी अर्जुन की तारीफ करने लगे। स्कूल में उसे विशेष रूप से सम्मानित किया गया।

रामू काका भी बहुत भावुक हो गए। “बेटा, अगर तुम न मिलते तो मेरा सब कुछ चला जाता। भगवान तुम्हारा भला करे।”

अर्जुन ने मुस्कुराते हुए कहा, “रामू काका, माँ कहती हैं कि किसी का हक़ कभी नहीं लेना चाहिए।”

समय बीतता गया, लेकिन अर्जुन का वही स्वभाव बना रहा। एक बार स्कूल में परीक्षा के दौरान एक लड़का नकल कर रहा था। अर्जुन ने देखा लेकिन चुप रहा। फिर उसने सोचा, “अगर मैं गलत को गलत नहीं कहूँगा, तो क्या मैं सच्चा रह पाऊँगा?”

उसने शिक्षक को सब बता दिया। हालांकि उस लड़के ने पहले उसे बुरा-भला कहा, लेकिन बाद में समझ गया और अर्जुन से माफी मांगी।

धीरे-धीरे अर्जुन का नाम गांव के बाहर भी फैलने लगा। एक सामाजिक संस्था ने उसकी ईमानदारी की कहानी पढ़ी और उसे स्कॉलरशिप देने का निर्णय लिया।

अब अर्जुन शहर जाकर पढ़ने लगा, लेकिन जब भी वह गांव आता, बच्चों को पढ़ाने के लिए समय निकालता। उसने एक छोटी लाइब्रेरी भी बनाई, जहाँ बच्चे आकर किताबें पढ़ सकते थे।

[अंतिम भाग – 10 साल बाद ]

अब अर्जुन एक बड़ा शिक्षक बन चुका था। उसका स्कूल बहुत प्रसिद्ध हो गया था। एक दिन एक बच्चा उसके पास आया और बोला, “सर, मैं भी आपकी तरह बनना चाहता हूँ।”

अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा, “तो सबसे पहले अपने अंदर सच्चाई और ईमानदारी लाओ, बाकी सब खुद-ब-खुद आएगा।”

नैतिक शिक्षा : Moral Of The Story

सच्चाई और ईमानदारी हमेशा जीतती है। हो सकता है ईमानदार बनने में कठिनाई हो, लेकिन अंत में उसका फल मीठा ही होता है।

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