अंधेरे से उजाले तक

शुरुआत की ठोकरें

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में रहने वाला अजय बचपन से ही संघर्षों से घिरा रहा। उसके पिता एक किसान थे और माँ गृहिणी। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, लेकिन अजय के सपनों में कोई कमी नहीं थी। बचपन में जब बच्चे खिलौनों से खेलते थे, अजय पुरानी किताबों को जोड़कर अपना खुद का स्कूल बनाता था।

स्कूल जाना उसके लिए एक सपना था, क्योंकि कई बार फीस के पैसे नहीं होते थे। अजय अक्सर अपने जूतों की मरम्मत खुद करता, और कई बार बिना चप्पल के ही स्कूल पहुँचता। लेकिन उसकी आँखों में हमेशा एक चमक होती—कुछ बड़ा करने की।

पहला संघर्ष

अजय पढ़ाई में अच्छा था। लेकिन गाँव के सरकारी स्कूल की शिक्षा सीमित थी। जब वह दसवीं कक्षा में आया, तो उसे लगा कि अब उसे शहर जाकर आगे की पढ़ाई करनी चाहिए। लेकिन पिता ने साफ मना कर दिया—”हमारे पास खेती के अलावा कुछ नहीं। तुम यहीं रहो और खेती में हाथ बँटाओ।”

अजय टूट गया। लेकिन उसकी माँ ने उसे समझाया, “बेटा, अगर तू ठान ले, तो भगवान भी तेरा रास्ता नहीं रोक सकते। तू पढ़ाई कर। मैं तेरे लिए कुछ भी करूंगी।” माँ ने अपने गहने गिरवी रखकर अजय को शहर के स्कूल में दाखिला दिलवाया।

शहर की ज़िंदगी

शहर में ज़िंदगी आसान नहीं थी। अजय ने एक चाय की दुकान पर काम करना शुरू किया। सुबह 5 बजे उठकर वह चाय बनाता, फिर स्कूल जाता और रात को होमवर्क करता। दिन में 18 घंटे की मेहनत ने उसके शरीर को थका दिया, लेकिन उसके इरादे को नहीं।

कई बार वह भूखा सोया, कई बार दुकानदार ने डांटा, लेकिन उसने हार नहीं मानी। बोर्ड परीक्षा आई और अजय ने पहले स्थान पर आकर सबको चौंका दिया। स्कूल के प्रधानाचार्य ने कहा, “तुम जैसे छात्रों पर हमें गर्व है।”

नया सपना – आईएएस

अब अजय का सपना बड़ा था—वह आईएएस बनना चाहता था। लेकिन यह राह आसान नहीं थी। दिल्ली जाकर कोचिंग करनी थी, लेकिन पैसे नहीं थे। उसने गाँव लौटकर खेत में काम करना शुरू किया और साथ ही बच्चों को ट्यूशन देने लगा।

धीरे-धीरे उसने 20 हज़ार रुपए जमा किए और दिल्ली चला गया। वहाँ उसने सबसे सस्ता कमरा लिया, दो समय की रोटी और रातों की नींद छोड़ दी।

असफलता की आहट

अजय ने पहले प्रयास में आईएएस की प्रारंभिक परीक्षा पास कर ली, लेकिन मुख्य परीक्षा में असफल हो गया। उसके पास पैसे खत्म हो गए थे, और उम्मीदें भी। एक दिन भूख से बेहोश होकर वह सड़क पर गिर पड़ा।

एक बुजुर्ग ने उसे उठाया और पूछा, “बेटा, क्या हुआ?” अजय ने रोते हुए कहा, “मैं हार गया हूँ बाबा।” बुजुर्ग बोले, “जो हार मान ले, वो जीवन भर पछताता है। लेकिन जो गिरकर उठे, वही इतिहास बनाता है।”

ये शब्द अजय के दिल में बैठ गए। उसने खुद को फिर से तैयार किया।

संघर्ष की लौ

अजय ने एक छोटी सी लाइब्रेरी में बैठकर फिर से तैयारी शुरू की। उसने हर दिन 12-14 घंटे पढ़ाई की। उसने अखबार पढ़े, नोट्स बनाए, मॉक टेस्ट दिए और आत्मविश्वास से भरा रहा।

दूसरे प्रयास में उसने प्रीलिम्स और मेंस दोनों पास कर लिए, लेकिन इंटरव्यू में चयन नहीं हुआ। यह फिर एक गहरी चोट थी, लेकिन अब वह टूटने वाला नहीं था।

उजाले की सुबह

तीसरे प्रयास में उसने खुद को पूरी तरह झोंक दिया। अब वह केवल एक परीक्षार्थी नहीं था, वह एक योद्धा बन चुका था। उसने अपने अंदर के डर, संदेह और थकान को हरा दिया।

परिणाम आया—अजय का चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा में हो गया। उसके गाँव में जश्न मनाया गया। माँ की आँखों से आंसू बह निकले—इस बार दुख के नहीं, गर्व के।

प्रेरणा का स्रोत

आज अजय हज़ारों युवाओं के लिए प्रेरणा है। वह सेमिनार्स में जाकर अपने अनुभव साझा करता है। एक बार किसी छात्र ने पूछा, “सर, आपने हार नहीं मानी, ऐसा क्या था जो आपको आगे बढ़ाता रहा?”

अजय मुस्कराया और बोला, “मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं था, लेकिन पाने के लिए सब कुछ था। जब माँ ने गहने गिरवी रखे, तब मैंने ठान लिया कि मैं उनका सपना अधूरा नहीं छोड़ूंगा।”


कहानी का सार:

“जो अंधेरे से लड़ने का हौसला रखता है, वही उजाले की कीमत समझता है।”

सफलता उन्हीं को मिलती है जो कठिनाइयों से हार नहीं मानते, बल्कि उन्हें सीढ़ी बनाकर ऊपर चढ़ते हैं।


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