“मन के जीते जीत – नन्हा योद्धा अर्जुन” : आत्मविश्वास, साहस, संघर्ष और सफलता


मन के जीते जीत : छोटे गाँव का बड़ा सपना

राजस्थान के एक छोटे से गाँव “सरसोड़ा” में एक 12 साल का लड़का रहता था — अर्जुन। उसका सपना था कुछ बड़ा करना, कुछ ऐसा जिससे उसके माँ-बाप का नाम रोशन हो। लेकिन गाँव की स्थिति बहुत साधारण थी — न अच्छी स्कूल, न अच्छे संसाधन। अर्जुन के पिता खेत में मजदूरी करते और माँ घर-घर जाकर सिलाई का काम करती थीं।

अर्जुन को पढ़ाई से बहुत लगाव था। वो दिन-रात किताबों में डूबा रहता, लेकिन गाँव के स्कूल में पढ़ाई का स्तर बहुत निम्न था। उसके अंदर ज्ञान पाने की जिज्ञासा थी, पर साधन नहीं।

एक दिन जब वह पास के शहर “बूंदी” गया, वहाँ उसने एक विज्ञान प्रदर्शनी देखी। उसे पहली बार एक रोबोट दिखाई दिया। उसकी आँखों में चमक आ गई। उसने मन में ठान लिया — “मैं भी विज्ञान में कुछ नया करूँगा, कुछ ऐसा बनाऊँगा जो लोगों की मदद करे।”



मन के जीते जीत : मुश्किलें और मज़ाक

जब अर्जुन ने गाँव लौटकर यह सपना अपने दोस्तों से साझा किया, तो सब हँस पड़े।

“अरे, तू रोबोट बनाएगा? तुझे पढ़ाई भी ढंग से नहीं आती!”

“हमारे जैसे गाँव के लड़के क्या कर सकते हैं?”

यह शब्द अर्जुन के दिल को चीर गए। लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने एक पुराना रेडियो तोड़कर उसके पुर्जों को जोड़ना शुरू किया। कभी पंखे से मोटर निकालता, तो कभी पुराने टॉर्च से बैटरी। उसका छोटा कमरा एक प्रयोगशाला बन गया था।

लेकिन समस्या यह थी कि उसके पास न किताबें थीं, न इंटरनेट, न कोई मार्गदर्शक। उसकी मदद उसकी “जिद और लगन” ने की।



मन के जीते जीत : “गुरु” मिला गाँव में

एक दिन गाँव में एक बुजुर्ग व्यक्ति आए — प्रोफेसर शर्मा, जो कभी दिल्ली विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर थे। अब वो अपने जीवन का उत्तरार्ध गाँव में सेवा करते हुए बिताना चाहते थे। जब उन्होंने अर्जुन को तारों और मोटरों से खेलते देखा, तो उन्हें उसकी आँखों में कुछ खास दिखा।

प्रोफेसर शर्मा ने अर्जुन को अपने पास बुलाया और कहा, “तुम्हारे अंदर एक वैज्ञानिक है। लेकिन अगर उसे दिशा नहीं मिली, तो वो खो जाएगा।”

इसके बाद हर शाम अर्जुन प्रोफेसर शर्मा के पास जाकर विज्ञान, गणित और तकनीक के बारे में सीखने लगा। उन्होंने उसे सिखाया कि सपनों को पाने के लिए मेहनत से ज़्यादा सही दिशा ज़रूरी है।



मन के जीते जीत : पहला आविष्कार

अर्जुन को समझ आ गया था कि गाँव के बच्चे गर्मियों में दूर तालाब से पानी लाने में बहुत थक जाते हैं। उसने सोचा — “क्यों न ऐसा यंत्र बनाऊँ जो बाल्टियों को खुद खींच लाए?”

कुछ हफ्तों की मेहनत के बाद, उसने एक सोलर-पावर्ड वॉटर पुलर बनाया — एक छोटा ट्रॉली जैसा यंत्र जो सूर्य की रोशनी से चलकर पानी से भरी बाल्टी को खींचकर गाँव तक लाता।

जब गाँव के लोगों ने इसे देखा, सब हैरान रह गए। वही लोग जो कभी उस पर हँसते थे, अब उसकी तारीफ कर रहे थे। गाँव के सरपंच ने कहा, “अर्जुन, तूने हमारे बच्चों की परेशानी दूर कर दी।”



मन के जीते जीत : राज्य स्तर की प्रतियोगिता

कुछ महीने बाद जिले में राज्य स्तरीय नवाचार प्रतियोगिता की घोषणा हुई। अर्जुन ने प्रोफेसर शर्मा की मदद से उसमें भाग लेने की ठानी। लेकिन टिकट, ठहरने और उपकरण ले जाने के लिए पैसे नहीं थे।

उसकी माँ ने अपनी चूड़ियाँ बेच दीं। पिता ने दो दिन खेत में ओवरटाइम किया। अर्जुन ने जब देखा कि उसके माता-पिता खुद को बेचकर उसके सपनों में निवेश कर रहे हैं, तो उसकी आँखें भर आईं।

प्रतियोगिता में पूरे राज्य के 500 बच्चे थे। सभी के पास महंगे उपकरण, बड़े स्कूलों के सपोर्ट और आधुनिक तकनीक थी। लेकिन अर्जुन के पास थी — भावना, जिद, और एक उपयोगी आविष्कार।

उसने अपना सोलर वॉटर पुलर सबके सामने प्रस्तुत किया। जब जजों ने उसका उद्देश्य सुना, तो उन्होंने पूछा, “ये तो बड़ी कंपनियाँ भी नहीं सोच पाईं, तुमने कैसे कर लिया?”

अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा, “सर, ज़रूरत ही सबसे बड़ी प्रेरणा होती है।”



मन के जीते जीत : अखबारों में नाम, लेकिन…

अर्जुन को राज्य स्तरीय नवाचार प्रतियोगिता में पहला स्थान मिला। उसके नाम की खबर अखबारों में छपी — “गाँव का बेटा बना वैज्ञानिक”।

अब उसे कई स्कूलों और विज्ञान संस्थानों से बुलावा आया, लेकिन अर्जुन ने सबसे पहले अपने गाँव लौटकर वहाँ के बच्चों के लिए एक “ज्ञान केंद्र” खोला। वहाँ पर बच्चे आकर विज्ञान की बातें समझते, प्रयोग करते और प्रश्न पूछते।

उसने यह साबित कर दिया कि अगर एक बच्चा पूरे गाँव की सोच को बदल सकता है, तो हर बच्चा एक क्रांति ला सकता है।



मन के जीते जीत : जीवन का सबसे बड़ा मंच

एक साल बाद उसे “डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम इनोवेशन अवॉर्ड” के लिए चुना गया। वह पहली बार दिल्ली आया, मंच पर प्रधानमंत्री के सामने उसने अपने विचार रखे — “बचपन से विज्ञान की समझ और समाज की सेवा ही देश को सशक्त बना सकती है।”

पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।


मन के जीते जीत : प्रेरणा का स्रोत

अब अर्जुन एक किशोर वैज्ञानिक बन चुका था, लेकिन उसने कभी अपना जुड़ाव गाँव से नहीं तोड़ा। हर महीने वह सरसोड़ा आता, वहाँ के बच्चों को सिखाता और नए-नए प्रयोग करवाता।

अर्जुन का जीवन इस बात की मिसाल बन गया कि छोटे गाँव से उठे सपने भी आसमान को छू सकते हैं, अगर इरादा मजबूत हो।


मन के जीते जीत : सीख और संदेश

  1. संघर्ष से घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि वही सफलता की सीढ़ी बनता है।
  2. सपनों की कोई सीमा नहीं होती — न उम्र की, न साधनों की।
  3. जो खुद पर विश्वास करता है, उसे दुनिया भी मान देती है।
  4. सच्ची शिक्षा वह है जो समाज की सेवा करे।

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