“वो लिफ्ट”

अमन को नाइट शिफ्ट की आदत थी। रोज़ की तरह उस रात भी वह 12:30 बजे ऑफिस से निकला। उसकी बिल्डिंग पुरानी थी और अक्सर लिफ्ट खराब रहती थी, लेकिन उस रात लिफ्ट चालू थी।

अचानक लिफ्ट रुक गई। डिस्प्ले पर लिखा था — –1 अमन चौंक गया। इस बिल्डिंग में बेसमेंट ही नहीं था।

लाइट्स हल्की-सी झपकने लगीं। तभी लिफ्ट के स्पीकर से एक धीमी आवाज़ आई— “दरवाज़ा मत खोलना।”

अमन का गला सूख गया। उसने इंटरकॉम दबाया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। फिर किसी ने बाहर से लिफ्ट का बटन दबाया। टिंग…

डिस्प्ले पर चमका — –2 लिफ्ट नीचे जा रही थी… बिना किसी बटन के। अचानक दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

बाहर एक लंबा, अंधेरा कॉरिडोर था। दीवारों पर लिफ्ट के शीशे लगे थे, और हर शीशे में अमन खड़ा था… लेकिन हर एक का चेहरा अलग था।

एक शीशे वाला अमन मुस्कुरा रहा था। दूसरा रो रहा था। तीसरा फुसफुसाया—

“जो यहाँ आया… वापस नहीं गया।” अचानक पीछे से किसी ने अमन के कंधे पर हाथ रखा। आवाज़ आई—

“अब अगली मंज़िल तुम्हारी है।” लिफ्ट का दरवाज़ा ज़ोर से बंद हुआ। अगली सुबह सिक्योरिटी ने लिफ्ट खोली। अंदर अमन नहीं था।

बस दीवार पर उँगलियों से लिखा था— “–3”

और उसी रात, किसी और ने लिफ्ट का बटन दबाया। टिंग… डिस्प्ले चमका—