तुम ही हो मेरी तक़दीर

प्रस्तावना

प्यार की कहानियाँ अक्सर किस्मत से बंधी होती हैं। कभी ये अधूरी रह जाती हैं, तो कभी वक्त के साथ अपने मुकाम तक पहुँचती हैं। यह कहानी भी एक ऐसे प्यार की है, जो वक्त की परीक्षा से गुज़रा, लेकिन अपनी तक़दीर खुद लिखने में कामयाब रहा।

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पहली मुलाकात

अर्पित और सिया की मुलाकात पहली बार कॉलेज के पहले दिन हुई थी। सिया एक चुलबुली, हंसमुख लड़की थी, जिसे हर कोई पसंद करता था। वहीं, अर्पित एक शांत और गंभीर स्वभाव का लड़का था, जो अपने काम में डूबा रहता था। जब पहली बार दोनों की नज़रें मिलीं, तो किसी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके दिलों ने एक अनकहा रिश्ता महसूस किया।

धीरे-धीरे, कॉलेज के दिनों में दोनों की दोस्ती गहरी होती चली गई। वे साथ में पढ़ते, कैंटीन में चाय पीते, और कभी-कभी क्लास बंक करके पूरे शहर में घूमते। सिया हमेशा अर्पित को अपनी दुनिया की छोटी-छोटी खुशियों से रूबरू करवाती, और अर्पित सिया को जीवन के गंभीर पहलुओं से परिचित कराता।


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इज़हार-ए-मोहब्बत

समय के साथ अर्पित को एहसास हुआ कि वह सिया से प्यार करने लगा है। लेकिन वह इस बात को कहने से डरता था। उसे लगता था कि कहीं सिया उसे सिर्फ दोस्त ही समझती हो।

एक दिन, जब दोनों कॉलेज के गार्डन में बैठे हुए थे, सिया ने अचानक पूछा, “अगर कोई तुम्हें बहुत पसंद करे, तो तुम उसे कैसे बताओगे?”

अर्पित ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “शायद मैं उसकी आँखों में देखूंगा और कहूँगा कि वो मेरी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत वजह है।”

सिया ने अर्पित की आँखों में देखा और कहा, “तो कह दो।”

अर्पित चौंक गया। उसने हिम्मत जुटाई और धीरे से कहा, “सिया, तुम मेरी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत वजह हो। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।”

सिया मुस्कुराई और बोली, “मुझे पता था। और मैं भी तुमसे उतना ही प्यार करती हूँ।”


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जुदाई का दर्द

लेकिन प्यार की कहानियाँ इतनी आसान नहीं होतीं। सिया के पापा को जैसे ही इस रिश्ते के बारे में पता चला, उन्होंने उसे अर्पित से दूर रहने को कहा। वे नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी किसी ऐसे लड़के से प्यार करे, जिसकी अभी कोई स्थिर नौकरी नहीं थी।

सिया ने बहुत कोशिश की, लेकिन उसके पापा नहीं माने। उसे कॉलेज के बाद दूसरे शहर भेज दिया गया, और अर्पित से उसका हर संपर्क छीन लिया गया।

अर्पित के लिए यह बहुत कठिन समय था। लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने खुद को सिया के लिए योग्य बनाने की ठान ली। उसने पढ़ाई पूरी की और एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली।


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तक़दीर का खेल

सालों बाद, जब सिया की शादी की बातें चल रही थीं, तभी एक दिन उसे एक मेल मिला। यह मेल अर्पित की तरफ से था।

“अगर तक़दीर हमें फिर से मिलाना चाहे, तो क्या तुम मेरी हो जाओगी?”

सिया का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने बिना देर किए जवाब दिया,

“मैं हमेशा से तुम्हारी ही थी, अर्पित।”


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खुशहाल अंत

सिया ने अपने माता-पिता को मनाने की कोशिश की, और इस बार उसकी सच्ची मोहब्बत जीत गई। अर्पित और सिया की शादी हो गई, और वे अपनी तक़दीर को खुद लिखने में कामयाब हो गए।

क्योंकि प्यार अगर सच्चा हो, तो तक़दीर भी उसे अलग नहीं कर सकती।

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