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“राखी के धागे”

छोटे से गाँव “संतोषपुर” में रहने वाले आरव और सिया की कहानी, एक ऐसा रिश्ता जो जन्म से नहीं, पर दिल से जुड़ा था। दोनों अनाथ थे, लेकिन अनाथालय की दीवारों के बीच जो रिश्ता पनपा, वो खून के रिश्तों से भी ज़्यादा गहरा था।

बचपन की डोर

सिया जब अनाथालय आई, तब वो सिर्फ़ 5 साल की थी। डरी-सहमी, आँखों में आँसू और दिल में डर था कि अब कौन उसका होगा। उसी समय 7 साल का आरव उसे देखकर मुस्कराया और अपने आधे बिस्किट उसे दे दिए। वो पहली मुस्कान, सिया की ज़िंदगी में उम्मीद की पहली किरण थी।

समय बीता। दोनों साथ पढ़ते, खेलते और एक-दूसरे की परछाई बन गए। हर रक्षाबंधन पर सिया अपनी पुरानी फ्रॉक से बनाई हुई राखी आरव को बाँधती और आरव हर बार वादा करता, “मैं हमेशा तेरी रक्षा करूंगा।”

संघर्ष की राह

जब आरव 18 साल का हुआ, उसे अनाथालय छोड़ना पड़ा। लेकिन वो चला गया एक वादा करके — “एक दिन मैं कुछ बनकर तुझे यहाँ से ले जाऊँगा।” उसने शहर जाकर नौकरी करना शुरू किया, छोटा-मोटा काम, एक वक्त का खाना, लेकिन दिल में एक ही ख्वाब — सिया को एक अच्छी ज़िंदगी देना।

सिया ने भी मेहनत की। वह पढ़ाई में तेज थी और उसे स्कॉलरशिप मिल गई। पर हर बार जब उसे कोई बड़ी मुश्किल आती, वो एक खत लिखकर आरव को भेजती। और आरव हर खत के जवाब में उसे हिम्मत देता — “तेरा भाई ज़िंदा है, तू हार नहीं सकती।”

जुदाई की कसक

एक दिन सिया का खत नहीं आया। आरव बेचैन हो उठा। जब कई दिन तक कोई खबर नहीं मिली, तो वो गाँव लौटा। वहाँ पता चला कि सिया की तबीयत बहुत खराब है — उसे लिवर की गंभीर बीमारी थी, और इलाज बहुत महंगा था।

आरव ने अपने सारे पैसे जमा किए, अपना मोबाइल तक बेच दिया, पर रकम कम पड़ रही थी। तब उसने एक खतरनाक फैसला लिया — उसने एक कंस्ट्रक्शन साइट पर जान जोखिम में डालकर काम करना शुरू किया, जहाँ ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं था। पर वो कहता, “मेरी बहन की जान से बड़ी कोई चीज़ नहीं।”

राखी की पुकार

रक्षाबंधन आ रहा था। अस्पताल में भर्ती सिया ने जब पूछा, “क्या मैं इस बार भी उसे राखी बाँध पाऊँगी?” तो नर्स की आँखों में भी आँसू आ गए।

उसी दिन आरव, खून से सना हुआ पर मुस्कराता चेहरा लेकर अस्पताल पहुँचा। उसके हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा था — जिसमें सिया के लिए एक कलाई घड़ी थी, और एक चिट्ठी — “तेरे हर पल की रक्षा करने के लिए, ये घड़ी तेरे भाई ने तेरे लिए खरीदी है।”

सिया ने काँपते हाथों से राखी बाँधी और बोली, “मुझे तेरे जैसा भाई नहीं, कोई भगवान भी नहीं दे सकता।”

नया सवेरा

इलाज सफल रहा। सिया ठीक हो गई। और कुछ सालों बाद, वह खुद एक डॉक्टर बन गई — अनाथ बच्चों का इलाज करने वाली।

आरव ने एक छोटी सी किताब की दुकान खोली, जहाँ सिया के बच्चे कहानियाँ सुनते हैं। हर साल रक्षाबंधन पर, सिया अब एक खास राखी बाँधती है — जिसमें हर साल एक नई कहानी जुड़ती है, उनके रिश्ते की।

रिश्ते खून से नहीं, भावना से बनते हैं। राखी का धागा सिर्फ एक रस्म नहीं, एक वादा है — हमेशा साथ निभाने का, चाहे हालात जैसे भी हों। आरव और सिया की कहानी हमें यही सिखाती है — प्यार, समर्पण और विश्वास से बढ़कर कोई बंधन नहीं।

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