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अधूरी चाहत का उजाला

गाँव की सुबह

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव सीतापुर की सुबह बाकी शहरों की तरह नहीं होती थी। यहाँ सूरज की पहली किरण जब खेतों पर गिरती थी, तो जीवन भी जाग उठता था। बैलों की घंटियों की आवाज़, औरतों की चक्की चलाते हुए गुनगुनाहट, और दूर मंदिर की आरती—सब मिलकर एक सजीव चित्र रचते थे।

इसी गाँव में रहता था अर्जुन, एक 14 साल का लड़का। उसके पिता एक मामूली किसान थे, और माँ एक सीधी-सादी गृहिणी। अर्जुन बेहद होशियार था, पढ़ाई में अव्वल, और स्वभाव से बेहद विनम्र। पर गरीबी ने उसे कई बार किताबों के पन्नों से दूर कर दिया था।

अधूरी ख्वाहिशें

अर्जुन का सपना था कि वह बड़ा होकर अध्यापक बने। वह चाहता था कि गाँव के सभी बच्चे पढ़ें, कुछ बनें, और शहरों की ओर भागने की बजाय गाँव को ही संवारें। पर हालात आसान नहीं थे। स्कूल की फीस, किताबें, कपड़े—सब एक बोझ बन जाते थे।

एक दिन गाँव में एक नया स्कूल खुला, और वहाँ एक अध्यापक आए – प्रो. शेखर। वे शहर से रिटायर होकर गाँव में बच्चों को मुफ्त में पढ़ाने आए थे। अर्जुन को यह सुनकर बेहद खुशी हुई। वह दौड़ता हुआ उनके पास गया।

“गुरुजी, क्या मैं भी पढ़ सकता हूँ? मेरे पास फीस नहीं है,” अर्जुन ने मासूमियत से पूछा।

शेखर जी मुस्कराए, “बिलकुल बेटा। ज्ञान पर किसी का अधिकार नहीं होता। तुम रोज आओ।”

उस दिन से अर्जुन की ज़िंदगी में एक नया मोड़ आया।

संघर्ष और सफलता

अर्जुन रोज़ सुबह खेतों में पिता की मदद करता, फिर स्कूल जाता, और शाम को दूसरों के खेतों में काम करता। उसकी लगन देखकर गाँव के और बच्चे भी पढ़ाई में रुचि लेने लगे। शेखर जी ने अर्जुन को ग्राम पुस्तकालय की देखरेख का ज़िम्मा दे दिया।

एक दिन गाँव में एक प्रतियोगिता हुई—”गाँव के भविष्य पर निबंध”। अर्जुन ने अपनी पूरी आत्मा डाल दी। जब परिणाम आए, तो पूरे गाँव में शोर था—अर्जुन प्रथम आया था, और उसे जिला स्तर की छात्रवृत्ति मिली।

आत्म-सम्मान की लौ

अब अर्जुन को शहर जाकर पढ़ने का मौका मिला, पर वह परेशान था—माँ-बाप को छोड़कर कैसे जाए? गाँव के बच्चों का क्या होगा?

शेखर जी ने उसे समझाया, “बेटा, तुम अब सिर्फ अपने लिए नहीं, पूरे गाँव के लिए पढ़ने जा रहे हो। जब लौटोगे, तो ये गाँव बदलेगा।”

अर्जुन ने अपनी आँखों में आँसू लेकर कहा, “मैं वादा करता हूँ गुरुजी, मैं लौटकर ज़रूर आऊँगा।”

शहर की चकाचौंध भी अर्जुन की सादगी को नहीं बदल पाई। उसने छात्रवृत्ति से पढ़ाई की, और कुछ वर्षों में एक शिक्षक बन गया।

लौटना

पाँच साल बाद, एक सुबह गाँव की पगडंडियों पर फिर एक जाना-पहचाना चेहरा दिखाई दिया—अर्जुन लौट आया था। अब वह एक सरकारी स्कूल में शिक्षक बन चुका था। पर उसका असली सपना था—अपने गाँव में एक स्कूल खोलना।

गाँव वालों ने उसका स्वागत किया, पर कुछ लोगों को उस पर विश्वास नहीं था। “अब क्या करेगा ये लड़का? पढ़-लिखकर आया है, शहर में नौकरी करे,” किसी ने ताना मारा।

पर अर्जुन चुप रहा। उसने पिता की पुरानी गोदाम जैसी झोपड़ी को साफ किया और उसमें एक छोटा सा स्कूल शुरू किया। नाम रखा: “प्रकाश केंद्र”—क्योंकि वह चाह रहा था कि हर बच्चे की ज़िंदगी में शिक्षा का उजाला फैले।

कठिन राहें

शुरुआत में बस 3 बच्चे आए। अर्जुन ने खुद लकड़ी की तख्तियाँ बनाई, पुराने कागज़ों से किताबें जुटाईं, और माँ से दाल-चावल लेकर बच्चों को दोपहर का खाना देना शुरू किया।

धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाई। गाँव के गरीब किसान, जो पहले बच्चों को खेतों में भेजते थे, अब उन्हें स्कूल भेजने लगे। अर्जुन ने यह शर्त रखी कि जो बच्चा स्कूल आएगा, उसे मुफ्त भोजन, किताबें, और कपड़े मिलेंगे।

यह सब अर्जुन अपनी तनख्वाह से कर रहा था। उसने खुद की ज़रूरतों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया।

चिट्ठी जो मिली

एक दिन, जब अर्जुन स्कूल बंद करके झाड़ू लगा रहा था, एक डाकिया आया। उसके हाथ में एक चिट्ठी थी—शेखर जी की। वह अब बहुत बीमार थे और अर्जुन को आखिरी बार देखना चाहते थे।

अर्जुन सबकुछ छोड़कर तुरंत शहर पहुँचा। जब वह अस्पताल पहुँचा, तो शेखर जी की आँखों में आँसू थे।

“तू वही अर्जुन है न, जो गाँव में उजाला फैलाना चाहता था?” उन्होंने काँपते हाथों से अर्जुन का हाथ थामा।

“हाँ गुरुजी, मैंने वादा निभाया,” अर्जुन ने आँखें पोंछते हुए कहा।

शेखर जी मुस्कुराए, और वहीं उनकी आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।

पूर्णता

अर्जुन ने शेखर जी की याद में एक बड़ा विद्यालय बनवाया—”शेखर ज्ञान निकेतन”। इसमें अब 300 से ज़्यादा बच्चे पढ़ते हैं, और वह गाँव जो कभी शिक्षा से अंजान था, आज राज्य की सबसे साक्षर पंचायतों में से एक है।

एक पत्रकार ने अर्जुन से पूछा, “आपको क्या मिला इस त्याग से?”

अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा, “जिस दिन कोई बच्चा अपने माँ-बाप से कहेगा कि वह भी अर्जुन सर जैसा बनना चाहता है, उस दिन मेरी चाहत पूरी हो जाएगी।”

Moral Of The Story :

सच्चा सुख दूसरों की सेवा में है। अपने सपनों को पूरा करना महान है, लेकिन जब आपके सपने किसी और की ज़िंदगी संवारें, तो वह ईश्वर की पूजा के बराबर होता है।

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