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मेहनती लकड़हारा

उत्तराखंड की घनी वादियों में बसा था एक छोटा-सा गांव — ‘काफलीगैर’। हरे-भरे जंगलों से घिरा, पहाड़ों की छांव में बसा यह गांव जितना सुंदर था, वहां के लोग उतने ही सीधे-सादे और मेहनती थे। इसी गांव में रहता था एक लकड़हारा — हरिराम।

हरिराम एक साधारण इंसान था। छोटे से फूस के घर में अपनी पत्नी सीता और बेटे मुन्ना के साथ रहता था। रोज़ सुबह उठकर जंगल जाता, लकड़ियां काटता, उन्हें बाजार में बेचता और उस पैसे से अपने परिवार का पेट पालता। उसका जीवन कठिन था, लेकिन वह कभी शिकायत नहीं करता था।

संघर्ष की शुरुआत

हरिराम की पत्नी अक्सर कहती, “हरि, इतना मेहनत करते हो, फिर भी घर में कुछ नहीं बचता। अगर किसी अमीर ज़मींदार के यहाँ काम कर लो तो शायद ज़्यादा पैसा मिलेगा।”

हरिराम मुस्कराता और कहता, “सीता, ईमानदारी और मेहनत ही मेरी असली पूंजी है। जब तक हाथ-पैर चल रहे हैं, तब तक मैं किसी के आगे हाथ नहीं फैलाऊँगा।”

एक दिन जब वह जंगल में लकड़ियां काट रहा था, उसकी कुल्हाड़ी का फल नदी में गिर गया। नदी की धार तेज़ थी, और फल देखते ही देखते पानी में बह गया। हरिराम परेशान हो गया — बिना कुल्हाड़ी के काम कैसे करेगा?

सच्चाई की परीक्षा

उसी समय नदी से एक प्रकाशमान आकृति उभरी। वह कोई साधारण प्राणी नहीं, बल्कि जल की देवी थी। देवी ने कहा, “हरिराम, तुम एक सच्चे और मेहनती इंसान हो। मैं तुम्हारी मदद करना चाहती हूँ।”

देवी ने हाथ में एक सोने की कुल्हाड़ी दिखाई और पूछा, “क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?”

हरिराम ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं देवी, यह मेरी नहीं है।”

फिर देवी ने चांदी की कुल्हाड़ी दिखाई। हरिराम ने फिर मना कर दिया।

अंत में देवी ने लोहे की कुल्हाड़ी दिखाई, जो हरिराम की थी। इस बार वह बोला, “हाँ देवी, यह मेरी कुल्हाड़ी है।”

देवी मुस्कराईं और तीनों कुल्हाड़ियाँ उसे दे दीं। “तुम्हारी ईमानदारी से मैं प्रसन्न हूँ। यह तुम्हारी मेहनत का फल है।”

प्रलोभन की परीक्षा

हरिराम ने जब घर आकर यह बात सीता को बताई, तो सीता की आँखों में लालच आ गया। उसने कहा, “अगर तुमने झूठ बोल दिया होता, तो तुम्हारे पास सिर्फ सोने की कुल्हाड़ी होती!”

अगले दिन गांव के एक और लकड़हारे – बलराम – ने जब यह सुना तो वह जल-भुन गया। वह सीधा उसी नदी पर गया और जानबूझकर अपनी कुल्हाड़ी नदी में फेंक दी। जब जलदेवी प्रकट हुईं और सोने की कुल्हाड़ी दिखाई, तो उसने झट से कह दिया, “हाँ देवी, यही मेरी कुल्हाड़ी है!”

देवी ने क्रोध से कहा, “तुम झूठ बोल रहे हो!” और बिना कुछ दिए जल में विलीन हो गईं।

बलराम खाली हाथ वापस लौटा। गांव वालों ने जब यह सुना, तो हरिराम की ईमानदारी की और भी प्रशंसा होने लगी।

जीवन की परीक्षा

समय बीतता गया। मुन्ना बड़ा हुआ, स्कूल जाने लगा। हरिराम ने अपने बेटे को हमेशा ईमानदारी और मेहनत की शिक्षा दी।

लेकिन एक दिन गांव में सूखा पड़ा। जंगल सूखने लगे, लकड़ियां कम होने लगीं। हरिराम को मजबूरी में दूर के जंगलों में जाना पड़ा। अब रोज़ का सफर और भी कठिन हो गया।

एक दिन वह थक कर एक पेड़ के नीचे बैठ गया और बोला, “हे भगवान, क्या मेरी मेहनत कभी रंग नहीं लाएगी?”

उसी समय एक साधु वहां से गुजरे। उन्होंने हरिराम को देखा और पूछा, “बेटा, दुखी क्यों हो?”

हरिराम ने सारी बात बताई।

साधु मुस्कराए और बोले, “जिस बीज को तूने अब तक सींचा है, उसका फल आने वाला है। लेकिन याद रख, मेहनत और ईमानदारी का रास्ता कठिन जरूर होता है, पर उसका फल मीठा होता है।”

परिश्रम का फल

कुछ ही समय बाद गांव में बारिश हुई। सूखा समाप्त हुआ। जंगल फिर से हरे-भरे हो गए।

हरिराम ने लकड़ियों का अच्छा व्यापार शुरू किया। उसने गांव के अन्य गरीबों को भी साथ लिया, उन्हें काम दिया। धीरे-धीरे हरिराम एक छोटे उद्यमी के रूप में उभरा, लेकिन उसने कभी अपना रास्ता नहीं बदला।

अब वह गांव के स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए चंदा देता, पेड़ों की रक्षा करता, और सबसे बड़ी बात – अपने बेटे को एक सच्चा इंसान बनाने की शिक्षा देता रहा।

अंतिम दिन

बुढ़ापे में हरिराम पेड़ों के नीचे बैठकर बच्चों को कहानियाँ सुनाता था — अपनी मेहनत, ईमानदारी, और संघर्ष की कहानियाँ।

एक दिन वह चुपचाप इसी तरह पेड़ के नीचे बैठा था, और धीरे-धीरे इस दुनिया से विदा ले गया — एक मुस्कराहट के साथ।

गांव में उस दिन हर आँख नम थी, लेकिन दिल गर्व से भरे थे।

Moral Of The Story :

“ईमानदारी और मेहनत का रास्ता भले ही कठिन हो, लेकिन उसका फल सदा मीठा और स्थायी होता है। जो इंसान सच्चाई के साथ आगे बढ़ता है, समय उसका साथ जरूर देता है।”

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