गुड़िया का जन्म
गाँव के किनारे एक छोटी-सी कच्ची झोपड़ी में रहती थी सात साल की गुड़िया। हाँ, उसका असली नाम गौरवी था, पर सब उसे प्यार से “गुड़िया” ही कहते थे। उसके पापा खेतों में मजदूरी करते और माँ पास के मंदिर में सफाई। घर में ज़्यादा कुछ नहीं था, पर गुड़िया की दुनिया में खुशियाँ कम न थीं।
एक दिन जब बारिश बहुत तेज़ हो रही थी और स्कूल बंद था, गुड़िया अपने आँगन में बैठकर मिट्टी से खेल रही थी। तभी उसने देखा कि पास के एक पेड़ के नीचे गीली मिट्टी एकदम मुलायम हो गई है। वह भागकर वहाँ गई और उस मिट्टी को इकट्ठा करके घर ले आई।
“माँ, मैं इससे कुछ बनाऊँ?” उसने उत्साह से पूछा।
“बना ले बेटा, लेकिन खेलने के बाद हाथ अच्छे से धो लेना,” माँ ने कहा।
गुड़िया ने दिन भर उस मिट्टी से एक छोटी सी गुड़िया बनाई। दो आँखें, छोटी-सी नाक, और मुस्कराहट वाली होंठ — जैसे-जैसे वो बनती गई, गुड़िया उसमें अपना प्यार उड़ेलती गई।
“मैं तुझे गोमती नाम दूँगी,” उसने मुस्कराते हुए कहा।
अब गोमती उसकी सबसे प्यारी दोस्त बन गई थी। वो उसे हर जगह साथ लेकर जाती — खेत, मंदिर, स्कूल तक!

दोस्ती की परछाइयाँ
गुड़िया के स्कूल में बाकी बच्चों के पास महंगी प्लास्टिक की गुड़ियाँ, खिलौने और रंग-बिरंगी पेंसिलें थीं। पर गुड़िया को गोमती से ज़्यादा कुछ प्यारा नहीं लगता था। एक दिन उसकी क्लास की लड़की रेशमा ने गोमती को देखा और हँसते हुए बोली, “ये कैसी गंदी गुड़िया है? मिट्टी से बनी है?”
गुड़िया ने गोमती को सीने से लगा लिया और कहा, “ये मेरी सबसे अच्छी दोस्त है।”
रेशमा ने फिर ताना मारा, “तू गरीब है, इसलिए तुझे असली खिलौने नहीं मिलते!”
गुड़िया की आँखों में आँसू आ गए, पर उसने कुछ नहीं कहा। उसने गोमती को अपने थैले में रखा और चुपचाप घर आ गई।
उस दिन गुड़िया ने पहली बार महसूस किया कि दुनिया की नज़र में उसकी गोमती शायद ‘मूल्यहीन’ थी। लेकिन उसके दिल में, गोमती अनमोल थी।

बिछड़ने का दुख
एक दिन स्कूल में चित्रकला प्रतियोगिता थी। विषय था “मेरा सबसे प्रिय दोस्त”। सभी बच्चे अपने दोस्तों के चित्र बना रहे थे — कुछ ने पालतू कुत्ते बनाए, किसी ने अपनी बहन, तो किसी ने पापा। गुड़िया ने गोमती की तस्वीर बनाई।
जब उसकी बारी आई तो उसने कहा, “मेरी सबसे अच्छी दोस्त है — गोमती। वह मिट्टी की है, पर उसमें मेरे सारे सपने हैं। जब मैं रोती हूँ तो वह मेरे साथ चुपचाप बैठती है। जब मैं हँसती हूँ, तो वह भी मुस्कराती है।”
क्लास में कुछ बच्चे हँसे, पर शिक्षक की आँखें नम थीं।
प्रतियोगिता के बाद जब गुड़िया स्कूल से घर लौटी, तो देखा उसका थैला खुला है। उसने गोमती को ढूंढा… पर वह कहीं नहीं थी!
उसने स्कूल लौटकर हर जगह ढूंढा, टीचर से पूछा, बाकी बच्चों से पूछा… पर गोमती कहीं नहीं मिली।
उस रात गुड़िया बहुत रोई। माँ ने उसे सीने से लगाया, “बेटा, शायद गोमती कहीं खो गई, पर वो तेरे दिल में है न?”
गुड़िया ने धीरे से सिर हिलाया, पर उसका दिल बहुत भारी था।

मिट्टी फिर मुस्कराई
अगले दिन स्कूल में सब बच्चों को टीचर ने एक नई बात सिखाई — “हर किसी की भावनाएँ अलग होती हैं। किसी के लिए जो मूल्यहीन है, वो किसी और के लिए सबसे कीमती हो सकता है।”
रेशमा धीरे से आई और बोली, “सॉरी गुड़िया, मैंने तुम्हारी गुड़िया को गलत समझा। वो सच में बहुत खास थी।”
गुड़िया ने मुस्कराकर कहा, “अब तो वो मेरे पास नहीं है, लेकिन शायद वो किसी और बच्चे को दोस्त बन गई हो।”
टीचर ने गुड़िया को चित्रकला प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार दिया और कहा, “तुमने सबसे सच्ची दोस्ती का चित्र बनाया।”
उसी शाम माँ ने एक छोटा-सा पैकेट गुड़िया को दिया। उसमें कुछ सूखी मिट्टी थी।
“ये तेरे पापा खेत से लाए हैं। तू फिर से अपनी गोमती बना सकती है।”
गुड़िया की आँखों में चमक आ गई।
उसने मिट्टी को नहलाया, गूंधा, प्यार से आकार दिया, और फिर से अपनी गोमती को जन्म दिया।

गोमती का संदेश
समय बीतता गया। गुड़िया बड़ी हुई — पढ़ाई में अव्वल, व्यवहार में नम्र और दूसरों की भावनाओं को समझने वाली।
अब वह स्कूल की सबसे प्रिय छात्रा थी। कभी जो रेशमा उसका मज़ाक उड़ाती थी, अब वही उसकी सबसे अच्छी दोस्त बन गई थी।
एक दिन स्कूल में “मूल्य और संवेदनशीलता” पर भाषण प्रतियोगिता थी। गुड़िया ने मंच पर जाकर कहा:
“कभी-कभी हमारी सबसे कीमती चीज़ें बाहर से साधारण दिखती हैं — जैसे मेरी गोमती। लेकिन उनके अंदर ऐसा भावनात्मक खजाना छिपा होता है जो हमें जीवन भर प्रेरित करता है।”
उस दिन पूरा स्कूल खड़ा होकर तालियाँ बजाता रहा।

Moral Of The Story
गुड़िया की कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा प्यार, दोस्ती और संवेदना चीज़ों की कीमत से नहीं, दिल से होती है। बच्चों को यह सीख मिलती है कि छोटी-छोटी चीज़ों में भी बड़ा प्रेम छुपा होता है।
