“पेड़ की आख़िरी पाती”

वह बूढ़ा पेड़ और राजू

गाँव के बीचों-बीच एक पुराना बरगद का पेड़ था। लोग उसे प्यार से “बब्बू पेड़” कहते थे। यह पेड़ वहाँ पिछले सौ सालों से खड़ा था। उसकी जड़ें ज़मीन के नीचे गहराई तक फैली थीं, और उसकी शाखाएँ आकाश को छूती हुई लगती थीं।

राजू नाम का एक सात साल का लड़का रोज़ इस पेड़ के पास आता था। वह घंटों पेड़ के नीचे बैठा रहता, उसके तने से लिपटकर बातें करता।

“बब्बू पेड़, क्या तुम मुझे सुन सकते हो?” राजू पूछता।

पेड़ की शाखाएँ धीरे-धीरे हिलतीं, जैसे वह हाँ कह रहा हो।

“माँ कहती है, पेड़ भी भगवान का रूप होते हैं। क्या तुम भगवान हो?”

शाखाएँ फिर हिलतीं और एक पत्ता राजू के सिर पर गिरता — उसका जवाब मिल गया।

बचपन की वो मीठी छांव

गाँव के सारे बच्चे बब्बू पेड़ के नीचे खेलते थे। कोई लुका-छिपी, कोई रस्सी कूद, तो कोई उसकी शाखाओं पर झूलता। गर्मियों की दोपहर में पेड़ की छांव किसी ठंडी गुफा जैसी लगती।

राजू को पेड़ के पास बैठकर किताबें पढ़ना पसंद था। वह अपनी पाठशाला की कहानियाँ बब्बू पेड़ को सुनाता।

“आज मैंने अकबर-बीरबल की कहानी पढ़ी। एक राजा था… और एक बुद्धिमान मंत्री।“

ऐसे ही दिन बीतते गए। राजू और बब्बू की दोस्ती गहरी होती चली गई।

शहर की आहट

एक दिन गाँव में एक जीप आई, जिसमें से कुछ अफसर और इंजीनियर उतरे। उन्होंने गाँव के प्रधान को बुलाया और कहा, “यहाँ से सड़क निकलेगी, शहर तक सीधी। आपके गाँव का भविष्य बदल जाएगा।”

प्रधान ने खुशी-खुशी हामी भर दी।

लेकिन एक समस्या थी — सड़क वहीं से निकलनी थी जहाँ बब्बू पेड़ खड़ा था।

“इसे काटना होगा,” एक इंजीनियर बोला।

राजू ने यह सुना तो दौड़ता हुआ पेड़ के पास गया और उसकी जड़ों को पकड़कर रोने लगा। “नहीं! बब्बू को मत काटो! वो मेरा दोस्त है!”

गाँव वालों ने राजू को समझाने की कोशिश की — “बेटा, विकास ज़रूरी है। नई सड़क से गाँव का भला होगा।”

पर राजू चुप नहीं बैठा।

पेड़ की आख़िरी पाती

अगले दिन राजू ने अपने अध्यापक से पेड़ और पर्यावरण पर लेख पढ़ने की गुज़ारिश की। उसने स्कूल के बच्चों को इकट्ठा किया, सबने पेड़ की देखभाल की बात समझी और ठान लिया कि वे बब्बू को बचाएँगे।

राजू ने बब्बू के लिए एक चिट्ठी लिखी:

“प्रिय बब्बू पेड़,”
“मैं वादा करता हूँ कि तुम्हें बचाने की पूरी कोशिश करूँगा। तुम मेरे दोस्त हो, मेरे गुरु भी। अगर तुम्हें कुछ हुआ, तो मेरे भीतर का एक हिस्सा भी टूट जाएगा। तुम्हारा बेटा, राजू।”

उसने वह चिट्ठी पेड़ के तने पर टाँग दी।

जब अगली सुबह जेसीबी मशीन आई, तो वहाँ सैकड़ों बच्चे पेड़ की रक्षा के लिए खड़े थे। सबने हाथ पकड़कर पेड़ के चारों ओर घेरा बना लिया।

अफ़सर हैरान रह गए। मीडिया भी आ पहुँचा। जब राजू ने अपनी चिट्ठी सबके सामने पढ़ी, तो बहुतों की आँखें भर आईं।

नई राह

प्रशासन को मजबूरन सड़क का नक्शा बदलना पड़ा। बब्बू पेड़ बच गया।

राजू को पर्यावरण दिवस पर सम्मानित किया गया। उसने मंच पर कहा:

“पेड़ हमें जीवन देते हैं। अगर हम पेड़ों की रक्षा करेंगे, तो वे हमारी। विकास ज़रूरी है, पर प्रकृति से लड़कर नहीं, उसके साथ मिलकर।”

बब्बू पेड़ की शाखाएँ उस दिन बहुत तेज़ हिलीं — जैसे उसने भी ताली बजाई हो।


Moral Of The Story


यह कहानी बच्चों को यह सिखाती है कि एक छोटा बच्चा भी बड़ा बदलाव ला सकता है — बस दिल में सच्ची लगन हो और प्रकृति के प्रति प्यार।

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