गाँव का प्यारा मेहमान
पहाड़ों से घिरे छोटे से गाँव नैसराग में एक सुंदर-सा बालक रहता था—अंशु। वह दस साल का था और पक्षियों का बहुत शौकीन था। हर सुबह वह खेतों की मेड़ पर बैठकर चिड़ियों की चहचहाहट सुनता, उनके नाम पहचानता और उनके बारे में पढ़ता।
एक दिन गाँव में अफवाह फैली कि पिछले पाँच वर्षों से दिखाई न देने वाला नीलकंठ पक्षी फिर से गाँव में देखा गया है। अंशु को जैसे अपने सपनों की पुकार मिल गई हो। नीलकंठ को देखने की इच्छा उसके मन में बहुत दिनों से थी।
“माँ, क्या मैं कल सुबह नीलकंठ को देखने जाऊँ?” अंशु ने पूछा।
माँ मुस्कुराई, “अगर समय पर उठ गए, तो ज़रूर जाओ। पर याद रखना, नीलकंठ शुभ पक्षी होता है, उसे तंग मत करना।”
पहली मुलाकात
अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ अंशु खेतों की ओर भागा। पेड़ों की फुनगियों पर बैठी ढेर सारी चिड़ियाँ चहक रही थीं, लेकिन उसका ध्यान तो बस एक ही पक्षी में था—नीलकंठ।
तभी उसे एक हल्की-सी नीली झलक दिखाई दी। जैसे ही वह नजदीक गया, वह पक्षी उड़कर एक आम के पेड़ पर बैठ गया। उसका नीला-हरा पंख, चमकती आँखें और गौरवमयी उड़ान देखकर अंशु मंत्रमुग्ध हो गया।
उसने चुपचाप दूर से देखा और बस देखा। यह उसकी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत सुबह थी।
दोस्ती की शुरुआत
अंशु हर दिन सुबह और शाम खेतों में जाकर नीलकंठ को देखता। धीरे-धीरे नीलकंठ भी उसकी उपस्थिति का आदी हो गया। वह अब अंशु से नहीं डरता, बल्कि उसकी ओर देखता और गर्दन हिलाकर जैसे उसे पहचानता।
एक दिन अंशु कुछ दाने ले गया। नीलकंठ पास तो नहीं आया, लेकिन दूर से बैठकर उसे देखता रहा।
अंशु ने पक्षियों के लिए पेड़ों पर पानी और दाने रखना शुरू किया। धीरे-धीरे और चिड़ियाँ भी आने लगीं।
संकट की आहट
गाँव के बाहर एक ठेकेदार ने जंगल कटवाना शुरू कर दिया। वहाँ की ज़मीन पर बड़ा होटल बनाने की योजना थी। बहुत से पेड़ काटे जाने लगे। चिड़ियाँ डर गईं। नीलकंठ कई दिनों तक नहीं दिखा।
अंशु बहुत दुखी हुआ। उसने पंचायत में शिकायत की, स्कूल में बात की, पोस्टर बनाए—”पेड़ बचाओ, पक्षी बचाओ।”
गाँव के कुछ समझदार बुजुर्गों ने उसका साथ दिया। सबने मिलकर ठेकेदार से बात की और उसे समझाया कि यह इलाका जैव विविधता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
वापसी और सम्मान
काफी प्रयासों के बाद ठेकेदार ने होटल का प्रोजेक्ट किसी और जगह शिफ्ट कर दिया। गाँव में पेड़ फिर से लगाए गए। चिड़ियाँ लौटने लगीं।
और एक दिन… नीलकंठ भी लौटा।
अंशु की आँखों में आँसू आ गए। उसका प्यारा दोस्त वापस आ गया था। गाँव वालों ने अंशु को “प्रकृति मित्र” का सम्मान दिया। स्कूल में भाषण देने के लिए बुलाया गया, जहाँ उसने कहा—
“अगर हम प्रकृति का ध्यान रखेंगे, तो प्रकृति हमारी रक्षा करेगी। नीलकंठ सिर्फ एक पक्षी नहीं है, वह विश्वास है, जीवन है।”
नई शुरुआत
अब अंशु ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक पक्षी संरक्षण क्लब शुरू किया। बच्चे हर रविवार पक्षियों के लिए घोंसले बनाते, दाने डालते और पेड़ लगाते।
गाँव में एक नई परंपरा शुरू हुई—हर जन्मदिन पर एक पौधा लगाना।
अंशु और नीलकंठ की दोस्ती अब पूरे गाँव की प्रेरणा बन चुकी थी।
Moral Of The Story
प्रकृति और पक्षियों की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। एक छोटा बच्चा भी बड़ा बदलाव ला सकता है अगर उसके पास सच्ची लगन और उद्देश्य हो।