यह कहानी गाँव के एक ऐसे आदमी की है जो शहर जाने की कोशिश करता है, लेकिन उसकी हर चाल में कुछ न कुछ गड़बड़ हो जाती है।

भाग 1: गाँव का बेताज बादशाह
हरिहरलाल, उम्र लगभग 45 साल, गाँव बड़खेलवा का सबसे ‘होशियार’ आदमी था—कम से कम वही ऐसा सोचता था। हर काम में अपनी राय देना, दूसरों को नसीहत देना और खुद कभी भी कुछ काम ना करना उसकी खासियत थी।
एक दिन गाँव के चौपाल में बैठकर उसने ऐलान किया, “अब बहुत हो गया देसी जीवन! अब मैं शहर जाकर कुछ बड़ा काम करूंगा। शायद कोई सरकारी अफसर बन जाऊं, या फिर फिल्म स्टार!”
सब हँसने लगे। रामू काका बोले, “तू और शहर? तुझे तो मोबाइल चलाना नहीं आता, तू मेट्रो कैसे पकड़ेगा?”
हरिहरलाल ने गर्व से कहा, “अरे रामू काका! मुझसे बड़ा जुगाड़ू कौन है? शहर वाले तो मुझसे सीखेंगे!”

भाग 2: पहली बार बस का सफर
हरिहरलाल ने एक पोटली बाँधी, जिसमें दो जोड़ी कपड़े, पाँच परांठे, एक लाल मिर्च का आचार और अपने गाँव के पंडित जी का दिया हुआ ‘सुरक्षा ताबीज़’ रखा। बस पकड़ने पहुँचा तो बस चलने ही वाली थी। वह दौड़कर चढ़ा, लेकिन उसकी पोटली गेट में अटक गई। बस के कंडक्टर ने पूछा, “कहाँ जाना है?”
हरिहरलाल बोला, “शहर!”
कंडक्टर ने कहा, “कौन सा शहर?”
“जो सबसे बड़ा हो!”
आखिर उसे लखनऊ भेज दिया गया।

भाग 3: शहर की पहली ठोकर
लखनऊ पहुँचते ही उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। इतने लोग, इतनी गाड़ियाँ, और ऊपर से ट्रैफिक का शोर! पहली गलती उसने तब की जब उसने एक ट्रैफिक सिग्नल को मंदिर समझकर माथा टेक दिया।
एक आदमी बोला, “पंडित जी, यहाँ क्या कर रहे हो?”
हरिहरलाल बोला, “ये तो बड़ा सुंदर मंदिर है! हर साइड से लाल-पीला चमक रहा है।”
वह आदमी हँसते-हँसते लोट-पोट हो गया।
भाग 4: होटल में हंगामा
उसे भूख लगी थी, सो एक होटल में गया। वेटर आया और पूछा, “क्या लेंगे?”
हरिहरलाल बोला, “जो सबसे महँगा हो!”
उसे ‘चाइनीज़ थाली’ दी गई। जैसे ही उसने नूडल्स उठाए, वो इतने लम्बे निकले कि वो सोचने लगा, “ये कौन सी सब्ज़ी है जो झूल रही है?”
उसने एक कौर मुँह में डाला और चिल्लाया, “अरे! ये तो केंचुआ है!”
होटल में सबकी हँसी छूट गई। मैनेजर बोला, “साहब, ये चाइनीज़ है।”
हरिहरलाल बोला, “चाइनीज़ है तो क्या? खाना है या साँप?”

भाग 5: नौकरी की तलाश
अब बारी थी नौकरी ढूँढने की। एक ऑफिस में इंटरव्यू देने गया।
HR ने पूछा, “आपने कौन सी डिग्री ली है?”
हरिहरलाल बोला, “गाय चराने में PhD है और कबड्डी में गोल्ड मेडलिस्ट हूँ।”
HR हैरान!
फिर उसने पूछा, “कंप्यूटर आता है?”
“कंप्यूटर क्या होता है?” हरिहरलाल ने मासूमियत से पूछा।
“अच्छा, आप जा सकते हैं।” HR बोला।
वो बाहर निकला और सोचने लगा, “शहर के लोग कितने बेवकूफ हैं, इतनी पढ़ाई कर ली फिर भी गाय नहीं चरा सकते!”

भाग 6: फिल्म में हीरो बनने की कोशिश
अब उसने सोचा, “जब लोग मेरी शक्ल देखकर हँसते हैं, तो मैं कॉमेडी फिल्म में हीरो बन सकता हूँ।”
वह एक फिल्म स्टूडियो पहुँचा और बोला, “मैं हीरो बनने आया हूँ।”
डायरेक्टर ने उसका हुलिया देखा—धोती-कुर्ता, सिर पर गमछा और आँखों में चमक। उसने कहा, “ठीक है, एक सीन करो—रोने वाला।”
हरिहरलाल बोला, “गाय मर गई है, अब मैं रोऊँगा।”
और वह ऐसे रोया कि डायरेक्टर भी हँसने लगा।
“तू हीरो नहीं, कॉमिक विलेन बनेगा!” डायरेक्टर ने कहा।
हरिहरलाल बोला, “जो भी बनाओ, बस पगार ठीक होनी चाहिए।”

भाग 7: गाँव वापसी
तीन दिन में ही उसका शहर का सपना चकनाचूर हो गया। एक दिन वह गलती से मॉल में चला गया और वहाँ लिफ्ट देखकर चिल्लाया, “अरे! दीवार में दरवाज़ा खुल गया!”
लोग फिर हँसे। उसका दिल टूट गया।
वह सोचने लगा, “अपने गाँव में सब मुझे ‘ज्ञानचंद’ कहते हैं, यहाँ तो मुझे ‘मूर्खलाल’ समझते हैं।”
अगली सुबह वो अपनी पोटली उठाकर सीधा बस अड्डे पहुँचा और वापसी की टिकट ली।
भाग 8: गाँव में वापसी का स्वागत
जब वह गाँव पहुँचा, सब ने पूछा, “का भइया, शहर में क्या कमाल किए?”
हरिहरलाल मुस्कराया और बोला, “शहर वालों को मैंने बहुत कुछ सिखाया—जैसे गाय चराना, मिर्च का अचार बनाना और ट्रैफिक सिग्नल को मंदिर मानना।”
सब ठहाका मारकर हँसने लगे।
रामू काका बोले, “अब समझ आया, तू यहीं सही है। शहर तो तुझसे भी बड़ा मसखरा निकला!”
हरिहरलाल ने सिर हिलाया और कहा, “अब मैं यहीं गाँव का ‘प्रधान सलाहकार’ बनूँगा। शहर जाए भाड़ में!”
