त्योहारों की यादें : छोटा-सा कस्बा “सादुलपुर” जहाँ हर गली, हर चौक, और हर आंगन में त्योहारों की एक अलग ही रौनक होती थी। दीपावली की जगमगाहट हो या होली की रंगीनियां, हर पर्व को लोग न सिर्फ परंपरा से, बल्कि दिल से मनाते थे। इस कहानी के केंद्र में है – शारदा देवी, एक वृद्धा, जिनके जीवन में अकेलापन था, लेकिन त्योहारों की यादें आज भी उनके जीवन का उजाला थीं।
त्योहारों की यादें : सूनापन और इंतजार
शारदा देवी की उम्र लगभग 75 वर्ष थी। उनके पति श्री रामकिशोर जी का देहांत 10 वर्ष पहले हो चुका था। उनका इकलौता बेटा – अजय, अब अमेरिका में बस चुका था। कभी-कभी ही फोन करता, और त्योहारों पर “ऑनलाइन” मिल जाता।
घर अब बड़ा खाली लगता था। जहां कभी ननद, देवर, बहुएं, बच्चे, रिश्तेदारों की चहल-पहल होती थी, अब वहां सिर्फ दीवारों की आवाज सुनाई देती थी।
हर साल की तरह इस बार भी दीपावली नज़दीक थी। घर के एक कोने में रखी मिट्टी की दीयों की टोकरी पर धूल जम चुकी थी। लेकिन इस बार शारदा देवी ने कुछ अलग करने की ठान ली।
त्योहारों की यादें : बीते कल की दीपावली
एक शाम वह पुराने ट्रंक को खोल बैठीं। उसमें रखे पीले पड़ चुके एल्बम, पुराने गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियाँ, और बच्चों की बनाई रंगोली के फोटो देखकर उनकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली।
उन्हें याद आया—कैसे दीपावली पर पूरा घर इकट्ठा होता था। अजय और बहू सीमा मिलकर घर सजाते, पोते रंगोली बनाते और रामकिशोर जी मिठाइयों का थाल सजाते।
एक बार अजय ने बचपन में अपने हाथ से एक दिया बनाया था, जो आज भी सुरक्षित था। वह दिया आज भी जल उठना चाहता था… शायद मां की ममता में।
त्योहारों की यादें : नई रौशनी की उम्मीद
शारदा देवी ने फैसला किया कि इस बार दीपावली अकेले नहीं मनाएंगी। उन्होंने पास की बस्ती के बच्चों को बुलाया, उन्हें मिठाइयाँ बनाई, मिट्टी के दीये रंगवाए, और दीपावली की परंपराएं सिखाईं।
उन्होंने बच्चों को रामायण के प्रसंग सुनाए—राम का वनवास, रावण वध और अयोध्या वापसी। उन्होंने बताया कि दीपावली सिर्फ रौशनी का नहीं, साथ, संस्कार और संवेदना का पर्व है।
बस्ती की महिलाएं भी उनके पास आने लगीं। किसी ने पूछा, “मांजी, क्या हम सब मिलकर लक्ष्मी पूजन करें?”
शारदा देवी की आंखें भर आईं। “बिलकुल बेटा… यही तो असली दीपावली है।”
त्योहारों की यादें : संस्कृति का दीप
दीपावली की रात, जब पूरा मोहल्ला बिजली की झालरों से सजा था, तब शारदा देवी के आंगन में बच्चों के हाथों से बने दीयों की एक सीढ़ी सी बन गई थी।
सबने मिलकर लक्ष्मी पूजन किया। शारदा देवी ने अपनी पुरानी साड़ी की किनारी काटकर लड़कियों को छोटी-छोटी चुनरी बनाई। मिठाइयाँ, पूजा की थाली, और आरती के साथ सबका दिल भर आया।
बस्ती की एक लड़की, गुड्डी, ने पूछा, “दादी, आपका बेटा नहीं आया क्या?”
शारदा ने मुस्कुराते हुए कहा, “आज तो इतने सारे बेटे-बेटियां आ गए हैं। मैं दुनिया की सबसे खुश मां हूँ।”
त्योहारों की यादें : संदेश मिला बेटे को
उसी रात, अजय ने वीडियो कॉल किया। मां के चेहरे पर सजी रौनक देखकर हैरान हो गया। “मां! आप इतनी खुश हैं?”
शारदा बोलीं, “हां बेटा, जब दिल खुले हों और संस्कृति जीवित हो, तो घर अपने आप रोशन हो जाता है।”
अजय कुछ पल खामोश रहा… फिर बोला, “मां, अगले साल हम दीपावली आपके साथ मनाएंगे… वादा है।”
शारदा देवी की आंखें भर आईं। एक दिया और जल गया — उम्मीद का।
त्योहारों की यादें : हर त्योहार में छिपा है रिश्ता
उसके बाद से हर त्योहार पर शारदा देवी बस्ती के बच्चों के साथ पूजा करतीं, कहानियाँ सुनातीं और मिलकर खाना बनातीं। अब वह अकेली नहीं थीं — संस्कृति ने उन्हें फिर से जोड़ दिया था समाज से, दिलों से।
वह अब सिर्फ एक वृद्ध महिला नहीं थीं, वह “त्योहारों की दादी” बन चुकी थीं।
लोहड़ी पर उन्होंने सबको तिल-गुड़ बाँटे और कहा—“जैसे तिल-गुड़ मिलकर मिठास बनाते हैं, वैसे ही हम सबकी साझेदारी त्योहारों को सच्चा बनाती है।”
त्योहारों की यादें : भारतीय संस्कृति का सार
त्योहार भारत की आत्मा हैं। वे सिर्फ पूजा या रिवाज नहीं, बल्कि स्नेह, साथ, और संवेदनशीलता का प्रतीक हैं।
शारदा देवी ने हमें ये सिखाया कि जब हम अपने आसपास के लोगों को साथ लेकर चलते हैं, जब हम दूसरों के जीवन में रौशनी भरते हैं, तभी त्योहार सच्चे अर्थों में मनते हैं।
उनका छोटा-सा आंगन, अब पूरे मोहल्ले का सांस्कृतिक केंद्र बन चुका था। वहाँ अब हर त्योहार, हर परंपरा, और हर संस्कृति एक साथ जीवित थी—माटी से जुड़े, दिल से जुड़े।
त्योहारों की यादें : उपसंहार
शारदा देवी की कहानी हमें बताती है कि त्योहार अकेले मनाने की चीज़ नहीं, यह संवाद, समर्पण और संस्कार का अवसर हैं।
भारतीय संस्कृति में हर पर्व अपने साथ रिश्तों की मिठास, सहयोग की भावना और समाजिक सौहार्द का संदेश लेकर आता है।
जब भी अगली बार दीप जलाएं, तो याद रखें—शारदा देवी जैसे लोग भी उस रौशनी के हकदार हैं, जिनके जीवन में त्योहार सिर्फ यादें बनकर रह गए हैं। उन्हें साथ लाना ही हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी सेवा है।