अधूरी मंज़िल से सफलता : गाँव की मिट्टी में पलता सपना
राजस्थान के एक छोटे से गाँव भोपतपुरा में रहने वाला मोहन एक सामान्य किसान परिवार से था। पिता खेतों में मजदूरी करते थे और माँ घर पर सादगी से जीवन जीती थीं। घर में ज़्यादा साधन नहीं थे, लेकिन मोहन के दिल में एक सपना था—अधिकारी बनना।
हर शाम जब वह खेत से लौटता, अपने झोपड़ी जैसे कमरे में बैठकर एक पुरानी किताब में आँखें गड़ाकर पढ़ता। गाँव के बाकी बच्चे खेल में मग्न होते, पर मोहन की दुनिया किताबों में सिमटी हुई थी।
“बेटा, पढ़ाई तो ठीक है, पर खेत में भी हाथ बँटाना ज़रूरी है,” – पिता अक्सर कहते।
“बाबूजी, अगर मैं आज खेत में रह गया, तो पूरी ज़िंदगी खेत में ही रह जाऊँगा,” मोहन दृढ़ता से जवाब देता।
अधूरी मंज़िल से सफलता : पहला संघर्ष – शहर की ओर पहला कदम
बारहवीं कक्षा में अच्छे अंक लाने के बाद मोहन ने ठान लिया कि वह जयपुर जाकर तैयारी करेगा। घर में पैसे नहीं थे, लेकिन माँ ने अपनी चूड़ियाँ बेच दीं।
“तू पढ़-लिखकर कुछ बन जा, यही मेरी दौलत होगी,” माँ की आँखों में आँसू थे।
जयपुर की भीड़, शोर, और तेज़ रफ्तार ज़िंदगी मोहन के लिए नई थी। वह एक छोटे से कमरे में चार और छात्रों के साथ रहता और एक चाय की दुकान पर काम करता था ताकि किराया और खाने का खर्च चला सके।
दिन में पढ़ाई, रात को काम—मोहन की ज़िंदगी एक जंग बन गई थी। थक कर चूर हो जाता लेकिन उसका सपना उसे जगाए रखता।
अधूरी मंज़िल से सफलता : नाकामी की पहली चोट
पहली बार उसने राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) की परीक्षा दी… और असफल हुआ।
होटल में काम करने वाले राधेश्याम काका ने देखा कि मोहन चुपचाप बैठा है।
“क्यों बेटा, हिम्मत हार गया क्या?”
मोहन ने आँखें पोंछीं, “सब कुछ दाँव पर लगा दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ।”
“सपनों का मतलब ही होता है कि उन्हें पाने के लिए बार-बार गिरा जाए, पर उठते रहो,” काका ने कहा।
उनके शब्दों ने मोहन की हिम्मत लौटा दी।
“अगली बार मैं खुद को साबित करके दिखाऊँगा,” उसने आत्मविश्वास से कहा।
अधूरी मंज़िल से सफलता : आत्मबल की लौ
अगले दो साल मोहन ने कठिन तपस्या की। मोबाइल नहीं, सोशल मीडिया नहीं, बस पढ़ाई और संकल्प।
इस बार उसने एक रणनीति बनाई:
समाचार पत्र से करंट अफेयर्स
NCERT से बेसिक क्लियर
हर रोज़ मॉक टेस्ट
पुराने पेपर का विश्लेषण
इस दौरान कई बार भूखा सोया, दोस्तों की शादी में नहीं गया, त्योहार नहीं मनाए। लेकिन उसके अंदर एक अग्नि थी जो बुझने का नाम नहीं ले रही थी।
अधूरी मंज़िल से सफलता : मेहनत का फल
तीसरे प्रयास में मोहन ने राजस्थान प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में तीसरी रैंक हासिल की।
जब परिणाम आया, वह चाय की दुकान पर था। उसके दोस्त ने दौड़ते हुए आकर बताया:
“मोहन! तू अफसर बन गया!”
मोहन की आँखों में आँसू थे।
“ये जीत मेरी माँ की है, उनके आँचल की है, उन चूड़ियों की है जो उन्होंने मेरे लिए बेचीं।”
पूरा गाँव मोहन के स्वागत के लिए उमड़ पड़ा।
जिस स्कूल में पढ़ता था, वहाँ के शिक्षक फख्र से बोले—
“देखो, ये है हमारे गाँव का हीरा।”
अधूरी मंज़िल से सफलता : नई उड़ान
आज मोहन एक ईमानदार और संवेदनशील अधिकारी है। उसने अपने गाँव में
एक पुस्तकालय बनवाया
गरीब छात्रों के लिए फ्री कोचिंग शुरू की
और गाँव की महिलाओं के लिए स्वरोजगार योजना चलाई।
वह हर बार जब छात्रों को प्रेरणा देता है, एक ही बात दोहराता है—
“सपने पूरे होते हैं, अगर उन्हें पूरा करने की ज़िद हो।”
अधूरी मंज़िल से सफलता : कहानी से सीख
पैसे की कमी लक्ष्य नहीं रोक सकती
परिवार का त्याग आपकी ताकत बनता है
हार से डरना नहीं, सीखना है
संघर्ष ही असली शिक्षक होता है
और सबसे बड़ा—अगर आप अपने लिए नहीं, समाज के लिए आगे बढ़ते हैं, तो सफलता आपको ही चुनेगी।