Site icon therealstory24

इम्तिहान-ए-मोहब्बत

दिल्ली की सर्दियों की वो सुबह कुछ खास थी। कोहरा फैला हुआ था, और चारों तरफ एक अलग ही खामोशी थी। राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर हमेशा की तरह भीड़ थी, पर उस दिन आरव का मन कुछ बेचैन था। शायद रात भर की नींद पूरी नहीं हुई थी या शायद किस्मत आज कुछ नया लिखने जा रही थी।

पहली मुलाकात

आरव, एक सीधा-सादा लड़का था, जो एक निजी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम करता था। वह रोज़ की तरह अपने ऑफिस जाने के लिए मेट्रो में चढ़ा, और तभी उसकी नज़र सामने खड़ी एक लड़की पर पड़ी। घुंघराले बाल, हल्की गुलाबी साड़ी, आँखों में काजल और हाथ में किताब — वो बिल्कुल किसी कविता जैसी लग रही थी।

“क्या मैं बैठ सकता हूँ?” उसकी आवाज़ ने आरव को चौंका दिया।

“हाँ-हाँ, ज़रूर।” आरव ने जल्दी से अपने बैग को गोद में रख लिया।

वो लड़की मुस्कराई और बैठ गई। नाम पूछा नहीं, पर चेहरा ज़ेहन में छप गया।

अजनबी से अपना

अगले कई दिनों तक वही मुलाकातें होती रहीं। दोनों एक ही समय की मेट्रो में चढ़ते, आरव हमेशा उसे देखता और वो मुस्कुरा देती। एक दिन, हिम्मत जुटाकर आरव ने पूछा, “आप रोज़ यही समय चुनती हैं मेट्रो के लिए?”

“हां, ऑफिस भी यही टाइम पे है।” उसने हल्की हँसी के साथ जवाब दिया।

“मैं आरव हूँ।”

“और मैं सान्या।”

बस, यहीं से एक नई कहानी शुरू हुई। हर दिन की छोटी-छोटी बातें, किताबों पर चर्चा, मौसम की बातें, और ज़िंदगी के सपनों की चर्चा — दोस्ती धीरे-धीरे गहराती चली गई।

ज़िंदगी की सच्चाई

अगले कुछ हफ्तों में आरव ने जाना कि सान्या एक मध्यमवर्गीय परिवार से थी, और उसके पिता की तबीयत ठीक नहीं रहती थी। उस पर घर की ज़िम्मेदारी थी और शादी को लेकर परिवार का दबाव भी।

“मैं किसी राजकुमार की तलाश में नहीं हूँ आरव, पर एक ऐसा साथी चाहिए जो हर हाल में मेरा साथ दे।” उसने एक दिन कहा।

आरव ने उसका हाथ थामा, “मैं हूँ न। मैं हर तूफान में तुम्हारे साथ हूँ।”

इम्तिहान

पर ज़िंदगी आसान नहीं होती। एक दिन सान्या ने आरव को बताया कि उसके घरवालों ने उसकी शादी तय कर दी है — एक ऐसे लड़के से जो विदेश में काम करता है।

“मैं मजबूर हूँ, आरव। मैं तुम्हें छोड़ना नहीं चाहती, पर…” उसकी आवाज़ टूट गई।

आरव चुप था। दिल रो रहा था, पर होंठ मुस्करा रहे थे। उसने बस इतना कहा, “अगर प्यार सच्चा है, तो लौटकर जरूर आएगा। मैं इंतज़ार करूंगा।”

इंतज़ार

तीन साल बीत गए। आरव ने ना कोई रिश्ता जोड़ा, ना सान्या की यादों से बाहर आया। उसकी ज़िंदगी जैसे रुक गई थी। वो अब एक बड़ी कंपनी में काम करता था, पर दिल में खालीपन था।

फिर एक दिन ऑफिस से लौटते वक्त वही मेट्रो, वही स्टेशन, और वही चेहरा — सान्या!

“आरव!” उसकी आँखों में आँसू थे।

“सान्या? तुम?” आरव हक्का-बक्का था।

“मैं लौट आई हूँ… उस शादी को मैंने मना कर दिया था। तुम्हारे बिना ज़िंदगी अधूरी लग रही थी। पापा अब ठीक हैं, और मैंने सबको मना लिया है।”

आरव की आँखें भी भर आईं — “मैंने कहा था न, अगर प्यार सच्चा है, तो लौटकर जरूर आएगा।”

हमेशा के लिए

अब वे दोनों साथ हैं — एक छोटे से घर में, जहां प्यार, भरोसा और सुकून है। आरव अब भी हर सुबह मेट्रो लेता है, और सान्या उसकी मुस्कान के साथ दरवाज़े तक आती है।

कभी-कभी ज़िंदगी हमें इम्तिहान देती है, पर अगर मोहब्बत सच्ची हो, तो हर इम्तिहान पास हो ही जाता है।

Exit mobile version