यह रही एक प्रेरणादायक हिंदी शिक्षा-केंद्रित कहानी है। यह कहानी एक ग्रामीण छात्र की है, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने सपनों को साकार करता है |
भाग 1: गाँव की धूप और सपना
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव बसेड़ीपुर में जन्मा राहुल एक सामान्य किसान परिवार से था। उसके पिता रामस्वरूप दिन-रात खेतों में मेहनत करते थे, और माँ सुशीला घर संभालती थीं। घर की माली हालत इतनी अच्छी नहीं थी कि बच्चे को बढ़िया स्कूल भेजा जा सके, लेकिन राहुल के अंदर कुछ खास था—सीखने की आग।
राहुल को किताबों से प्यार था। गाँव के सरकारी स्कूल में वो मिट्टी में बैठकर भी ध्यान लगाकर पढ़ता। उसके पास न तो ढंग की कॉपी होती, न किताबें पूरी, लेकिन फिर भी वो जो भी टुकड़ों में मिलता, उसे पूरी लगन से पढ़ता।
पढ़ाई के प्रति उसका जुनून देख माँ अक्सर कहती, “बेटा, तू जरूर कुछ बड़ा करेगा।” और राहुल हँसकर कहता, “माँ, मैं आईएएस बनूँगा। गाँव की हालत बदलूँगा।”
भाग 2: संघर्ष की शुरुआत
आठवीं तक की पढ़ाई गाँव में हुई, लेकिन दसवीं से आगे की पढ़ाई के लिए पास के कस्बे बड़ागाँव जाना पड़ता था। वहाँ तक पहुँचने के लिए 6 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। सुबह 5 बजे उठना, थोड़ा पढ़ना और फिर नाश्ता करके निकल जाना। बरसात हो, ठंडी हो या गर्मी—राहुल कभी नहीं चूका।
कॉपी-किताबें खरीदना मुश्किल होता, इसलिए पुराने किताबों की दुकान से सस्ते में खरीदी जाती थीं। कई बार भूखे पेट भी स्कूल जाना पड़ा, लेकिन राहुल का ध्यान लक्ष्य पर था।
दसवीं में उसने जिला टॉप किया। पूरे गाँव में उसके नाम की चर्चा होने लगी। स्कूल के प्रधानाचार्य ने कहा, “यह लड़का दूर जाएगा, इसे रोकना मत।”
भाग 3: शहर की दुनिया
दसवीं के बाद राहुल को आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना पड़ा। लखनऊ में उसका दाखिला एक इंटर कॉलेज में हुआ। रहने के लिए उसे एक धर्मशाला में कमरा मिला, जहाँ और भी गरीब छात्र रहते थे। वहाँ उसे पहली बार असल दुनिया से सामना हुआ—प्रतियोगिता, संसाधनों की कमी और अकेलापन।
वो दिन में कॉलेज जाता और रात को घंटों स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ता। कई बार भूख लगती तो सिर्फ पानी पीकर सो जाता। लेकिन एक लक्ष्य था—UPSC की परीक्षा पास करना।
भाग 4: पहली हार, लेकिन हार नहीं मानी
12वीं में भी राहुल ने अच्छे अंक प्राप्त किए। अब बारी थी स्नातक और UPSC की तैयारी की। उसने दिल्ली में एक सरकारी लाइब्रेरी में पढ़ाई शुरू की, वहीं रहकर सस्ते में खाना खाता और सस्ते कमरों में रहता।
पहला अटेम्प्ट—फेल।
दूसरा अटेम्प्ट—प्रिलिम्स पास, मेंस में फेल।
तीसरा अटेम्प्ट—इंटरव्यू तक पहुँचा, लेकिन अंतिम सूची में नाम नहीं आया।
हर बार असफलता उसे तोड़ती, लेकिन माँ की एक चिट्ठी उसे संबल देती, जिसमें लिखा होता, “बेटा, हार मत मानना, तुझे भरोसा है न खुद पर, बस वही काफ़ी है।”
भाग 5: आख़िरी प्रयास, नई सुबह
राहुल ने खुद को एक साल और दिया। इस बार उसने अपनी कमज़ोरियों को पहचाना, उत्तर लेखन में सुधार किया, और समय का सही उपयोग किया। वह हर दिन खुद को याद दिलाता, “अगर अब नहीं कर पाया, तो फिर कभी नहीं।”
UPSC 4th Attempt
Prelims—पास
Mains—पास
Interview—पास
Final Result—IAS राहुल कुमार (AIR 36)
पूरे गाँव में ढोल बजे, मिठाइयाँ बाँटी गईं। पिता की आँखों से आँसू बह रहे थे, और माँ का चेहरा गर्व से चमक रहा था।
भाग 6: गाँव की वापसी और बदलाव
राहुल की पहली पोस्टिंग झारखंड के एक नक्सल प्रभावित क्षेत्र में हुई। वहाँ उसने शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क के क्षेत्र में क्रांति ला दी। कुछ वर्षों बाद उसे उत्तर प्रदेश में पोस्टिंग मिली और वह अपने ही गाँव के पास एसडीएम बना।
अब वो उसी स्कूल में गया, जहाँ मिट्टी में बैठकर पढ़ा करता था। बच्चों से कहा, “मैं तुम लोगों में से ही हूँ। अगर मैं कर सकता हूँ, तो तुम भी कर सकते हो।”
उसने गाँव में एक लाइब्रेरी बनवाई, जिसमें हर गरीब बच्चे को मुफ्त किताबें मिलती हैं। वहाँ एक बोर्ड टंगा है—“सपने वही सच होते हैं जिनके लिए नींद कुर्बान करनी पड़ती है।”
निष्कर्ष
यह कहानी सिर्फ राहुल की नहीं, हर उस छात्र की है जो कठिनाइयों में भी अपने सपनों को जीवित रखता है। शिक्षा सिर्फ नौकरी पाने का ज़रिया नहीं है, यह समाज को बदलने की शक्ति है। अगर आपमें धैर्य, मेहनत और लगन है, तो कोई ताकत आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।