“आख़िरी दरवाज़ा”

“आख़िरी दरवाज़ा”

“रात बारह बजे के बाद आख़िरी दरवाज़ा मत खोलना।”

आरती ने सवाल नहीं किया। उसे लगा यह कोई पुरानी रस्म या अंधविश्वास होगा। पहली कुछ रातें सामान्य रहीं। लेकिन चौथी रात ठीक 12:07 पर उसके फ्लैट के बाहर हल्की-सी दस्तक हुई। ठक… ठक…

आरती ने घड़ी देखी। उसके दिमाग में मकान मालिक की बात गूँज गई। उसने दरवाज़े की ओर देखा—पर बाहर कोई आवाज़ नहीं आई।

आरती ने घड़ी देखी। उसके दिमाग में मकान मालिक की बात गूँज गई। उसने दरवाज़े की ओर देखा—पर बाहर कोई आवाज़ नहीं आई।

अगली रात फिर वही समय। वही दस्तक। तीसरी रात दस्तक के साथ एक आवाज़ भी आई— “आरती… दरवाज़ा खोलो।”

अगली रात फिर वही समय। वही दस्तक। तीसरी रात दस्तक के साथ एक आवाज़ भी आई— “आरती… दरवाज़ा खोलो।”

उसका नाम? आरती का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसने फोन उठाया और मकान मालिक को कॉल किया। फोन उठा ही नहीं। दस्तक तेज़ होती गई।

“आरती… देर हो रही है।” दरवाज़े के नीचे से एक काली परछाईं अंदर फैलने लगी। परछाईं इंसान जैसी नहीं थी—उसके हाथ ज़मीन पर रेंग रहे थे। आरती पीछे हटी। तभी उसे दिखा—उसके फ्लैट के अंदर एक और दरवाज़ा था, जो उसने पहले कभी नोटिस नहीं किया था। उस दरवाज़े पर लिखा था—

“आख़िरी दरवाज़ा” उसे याद नहीं था कि वहाँ कोई दरवाज़ा था। बाहर की दस्तक अब दीवारों में गूँज रही थी। उसने डर के मारे “आख़िरी दरवाज़ा” खोल दिया। अंदर… पूरा फ्लैट वैसा ही था, जैसा उसका अपना।

लेकिन वहाँ वह खुद खड़ी थी—बिल्कुल शांत, मुस्कुराती हुई। उसने धीरे से कहा—

लेकिन वहाँ वह खुद खड़ी थी—बिल्कुल शांत, मुस्कुराती हुई। उसने धीरे से कहा—

“अब तुम बाहर रहोगी… आज मेरी बारी है।” पीछे से असली दरवाज़ा अपने आप खुल गया। अगली सुबह मकान मालिक आया

फ्लैट खाली था। बस दरवाज़े के अंदर एक नया नोट चिपका था— “रहने वाला बदल दिया गया।” और रात 12:07 पर फिर से दस्तक हुई।