“सफलता की आख़िरी सीढ़ी”

अर्जुन मेहरा—शहर का सबसे सफल बिज़नेसमैन। 40 साल की उम्र में करोड़ों की कंपनी, लग्ज़री बंगला, नाम… सब कुछ था। लोग कहते थे—

“इस आदमी ने ज़िंदगी जीत ली है।”

“इस आदमी ने ज़िंदगी जीत ली है।”

लेकिन हर रात 3:17 बजे अर्जुन की नींद खुल जाती थी। उसी समय। हर रात।

पहली बार उसने इसे थकान समझा। मगर एक रात बेडसाइड टेबल पर रखी घड़ी ने उसे डरा दिया। घड़ी चल रही थी… पर समय 3:17 पर ही अटका हुआ था।

अगली सुबह ऑफिस में उसके केबिन के बाहर एक लिफाफा पड़ा मिला। अंदर बस एक लाइन लिखी थी—

“अगली सीढ़ी तैयार है।”

“अगली सीढ़ी तैयार है।”

कोई साइन नहीं।

उस दिन से अर्जुन की सफलता और तेज़ हो गई। डील्स अपने आप क्लोज़ होने लगीं। राइवल्स गायब हो गए। शेयर मार्केट में हर फैसला सही निकलता

लेकिन… हर रात 3:17 पर एक नई चीज़ होती।

कभी दीवार पर सीढ़ियों की परछाईं दिखती, कभी किसी के कदमों की आवाज़, और कभी शीशे में खड़ा कोई और अर्जुन

एक रात आवाज़ आई— “ऊपर आओ।”

अगले दिन उसकी ऑफिस बिल्डिंग में एक नई मंज़िल जुड़ी दिखी—

जबकि उस बिल्डिंग में कभी उतनी मंज़िलें थीं ही नहीं।

लिफ्ट में सिर्फ एक बटन था—

अर्जुन अंदर गया।

अर्जुन अंदर गया। 

लिफ्ट रुकी। दरवाज़ा खुला। सामने एक अंतहीन सीढ़ी थी… और दीवार पर लिखा था—

लिफ्ट रुकी। दरवाज़ा खुला। सामने एक अंतहीन सीढ़ी थी… और दीवार पर लिखा था—

“यहाँ तक तुम अकेले आए हो।”

“यहाँ तक तुम अकेले आए हो।”

अगली सुबह अख़बारों की हेडलाइन थी— “बिज़नेस टायकून अर्जुन मेहरा अचानक लापता” लेकिन ......

अगली सुबह अख़बारों की हेडलाइन थी— “बिज़नेस टायकून अर्जुन मेहरा अचानक लापता” लेकिन ......

लेकिन उसी दिन शेयर मार्केट में उसकी कंपनी का स्टॉक रिकॉर्ड हाई पर था। और रात 3:17 पर…

लेकिन उसी दिन शेयर मार्केट में उसकी कंपनी का स्टॉक रिकॉर्ड हाई पर था। और रात 3:17 पर…

उसकी घड़ी फिर से चलने लगी।

उसकी घड़ी फिर से चलने लगी।