“चिट्ठियाँ जो कभी भेजी नहीं गईं”

"चिट्ठियाँ जो कभी भेजी नहीं गईं" एक भावनात्मक और सच्चाई के करीब कहानी है, जो भाई-बहन के रिश्ते, समय की दूरी, और अधूरे एहसासों के इर्द-गिर्द घूमती है।

वह आखिरी सुबह

सर्दियों की एक सुस्त सुबह थी। दिल्ली की गलियों में कोहरा पसरा हुआ था और सूरज अब तक आसमान से नदारद था। 65 वर्षीय सुधा देवी अपनी पुरानी अलमारी के सामने बैठी थी। हर संडे की तरह आज भी वह कुछ पुराना तलाश रही थीं—शायद कोई पुरानी रजाई, कोई पुराना फोटो, या… कोई याद।

अलमारी के नीचे के खाने से जब उन्होंने एक पुराना टीन का डिब्बा निकाला, तो उनके हाथ काँप गए। ये वही डिब्बा था जिसमें उन्होंने कभी चिट्ठियाँ रखी थीं। उन चिट्ठियों को उन्होंने कभी पोस्ट नहीं किया था। वो चिट्ठियाँ थीं—उनके छोटे भाई मनु के नाम।

मनु, यानी मनीष—जो पिछले 35 सालों से उनसे न तो मिला, न कोई खबर भेजी।

चिट्ठियों की शुरुआत

पहली चिट्ठी उन्होंने 1989 में लिखी थी। तब मनु बस 20 साल का था और घर छोड़कर मुंबई चला गया था—अपने सपनों की तलाश में। सुधा ने उसे रोका था, बहुत समझाया था, लेकिन मनु ने कहा था, “दीदी, मैं अपनी दुनिया बनाना चाहता हूँ।”

पहली चिट्ठी में सुधा ने लिखा था:

“मनु, वहाँ सब कैसा है? क्या खाने को ठीक से मिलता है? सर्दी में खुद का ख्याल रखना। माँ बहुत रोती हैं, और पापा हर वक़्त गुस्से में रहते हैं… लेकिन तेरी दीदी, तुझे बहुत याद करती है। कभी तो लौट आओ।”

पर वह चिट्ठी कभी पोस्ट नहीं की गई। सुधा को डर था—अगर वह पढ़ेगा भी, तो क्या जवाब देगा? क्या लौटेगा?

अधूरी चिट्ठियाँ, अधूरे जज़्बात

साल दर साल बीतते गए और चिट्ठियाँ बढ़ती गईं। हर चिट्ठी में एक नया जज़्बात होता—कभी ग़ुस्सा, कभी शिकायत, कभी सिर्फ़ सन्नाटा।

1992 की चिट्ठी में उन्होंने लिखा:

“मनु, अब तो माँ भी नहीं रहीं। आख़िरी वक़्त में तुझे ही पुकारती रहीं। तू क्यों नहीं आया? क्या तुझे बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ा?”

1997 में जब सुधा की शादी टूट गई थी, तब उन्होंने एक और चिट्ठी लिखी:

“मनु, तू होता तो मैं टूटती नहीं। सब कहते हैं कि मैं मजबूत हूँ, लेकिन तेरी दीदी अंदर से कितनी अकेली है, ये कोई नहीं जानता।”

पर हर बार वही होता—चिट्ठी अलमारी के डिब्बे में चली जाती।

मनु की चुप्पी और सुधा की उम्मीद

कई बार सुधा ने मनु को खोजने की कोशिश की। रिश्तेदारों से पूछा, पुराने दोस्तों से संपर्क किया, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। कुछ कहते थे कि वह अब विदेश में है, किसी ने कहा—वो अब एक फिल्म स्टूडियो में काम करता है।

पर सुधा ने उम्मीद नहीं छोड़ी।

हर साल रक्षाबंधन पर वह राखी के साथ एक चिट्ठी लिखती और उसे उसी डिब्बे में रख देती।

"तेरे बिना राखी अधूरी लगती है, मनु। याद है जब तू छोटा था और कहता था, 'दीदी, जब बड़ा हो जाऊँगा तो तुझे सोने की राखी दूँगा'? अब वो वक़्त आ गया है… बस तू ही नहीं आया।"

एक अनजाना खत

2024 की गर्मियों में सुधा को एक अजीब-सी चिट्ठी मिली। उस पर कोई नाम नहीं था, सिर्फ़ लिखा था: “दीदी के लिए”। अंदर एक छोटा-सा खत था:

"दीदी, शायद मैंने बहुत देर कर दी। बहुत कुछ कहना था, पर हिम्मत नहीं हुई। तुम्हारी हर चिट्ठी मेरे पास थी… हाँ, मैं पढ़ता था। डाकिया रामू काका अब भी मुझे देता था… वह जानते थे कि मैं कौन हूँ। पर मुझे डर था कि मैं क्या जवाब दूँ। अब जब खुद को माफ़ करना मुश्किल हो गया है, तो बस ये एक आखिरी चिट्ठी है…"

सुधा की आँखों में आंसू थे—उसने डिब्बे से सारी चिट्ठियाँ निकालकर एक-एक कर के पढ़ीं। हर शब्द जैसे दिल के ज़ख्म कुरेद रहा था।

आख़िरी चिट्ठी

सुधा ने उस दिन पहली बार एक चिट्ठी को पोस्ट किया।

"मनु, अब कुछ कहने को नहीं बचा है। बस एक बात जान लो—दीदी अब भी तुझसे उतना ही प्यार करती है जितना पहले किया करती थी। तू कहीं भी हो, खुश रह। मेरी चिट्ठियाँ अब तुझे मिलती रहेंगी—पर इस बार वो अलमारी के डिब्बे में नहीं होंगी, तेरे नाम पोस्ट की जाएंगी। और एक दिन, जब तू लौटेगा… मैं इंतज़ार करूँगी।"

चिट्ठियाँ अब भी आती हैं

आज भी हर महीने पोस्ट ऑफिस से एक चिट्ठी जाती है—मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, पता कुछ नहीं… सिर्फ़ नाम के साथ: “मनीष कुमार, जहाँ भी हो, अपनी दीदी से मिलने आ जाओ।”

"चिट्ठियाँ जो कभी भेजी नहीं गईं", अब उड़ान भर चुकी हैं।

कभी-कभी… इंतज़ार भी एक प्रेम होता है।

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