अजनबी पत्र
राजू एक छोटे से गांव “आशापुर” में रहता था। वह दस साल का था और किताबें पढ़ने का बहुत शौक़ीन था। उसका सबसे अच्छा दोस्त था — एक पुराना कुत्ता “शेरू”, जो उसके साथ स्कूल भी जाता था।
एक दिन राजू को एक पुराना लिफाफा मिला जो उसके आंगन में गिरा पड़ा था। लिफाफे पर लिखा था:
“जिसने भी यह पत्र पढ़ा, कृपया मेरी मदद करें। मैं जंगल में फंसा हुआ हूँ — अर्जुन”
राजू चौंक गया। अर्जुन कौन था? जंगल में क्यों फंसा था? क्या यह मज़ाक था या कोई सच में मदद मांग रहा था?
उसकी आंखों में चमक आ गई — एक रहस्य की खोज!

साहसिक निर्णय
राजू ने यह बात अपने माता-पिता को बताई, लेकिन वे हँस दिए — “अरे बेटा, कोई पुराना मज़ाक होगा। जंगल में अब कोई नहीं रहता।”
पर राजू को यकीन था कि यह मज़ाक नहीं है।
अगले दिन छुट्टी थी। राजू ने बैग में टॉर्च, बिस्किट, पानी की बोतल, और अपने दादा की पुरानी नक्शा-किताब रखी। शेरू उसके साथ चल पड़ा।
दोनों जंगल की ओर निकल पड़े।

जंगल का पहला मोड़
जंगल के पहले हिस्से में सब सामान्य था। चिड़ियों की आवाज़ें, पत्तों की सरसराहट… पर जैसे-जैसे वे अंदर बढ़े, एक अजीब सी खामोशी पसर गई।
राजू ने नक्शा देखा। वहां एक “पुराना कुआँ” दर्शाया गया था। जैसे ही वे वहां पहुँचे, एक टूटे हुए पुल की तरह बना कुआँ नजर आया।
पास ही मिट्टी पर कुछ निशान दिखे — किसी के पैरों के। बहुत पुराने नहीं थे।
शेरू भौंकने लगा। शायद कोई था वहां।

रहस्यमय झोपड़ी
कुएं के पास से एक पतली पगडंडी जा रही थी। राजू ने उस पर चलने का निश्चय किया। कुछ ही दूर पर उन्हें एक छोटी सी झोपड़ी दिखी, जिसके दरवाज़े पर ताला नहीं था।
अंदर एक आदमी बैठा था — बूढ़ा और थका हुआ।
“तुम अर्जुन हो?” राजू ने पूछा।
वह चौंका, फिर धीरे से बोला — “तुमने मेरा पत्र कैसे पाया?”
राजू ने सब बताया। अर्जुन की आंखों में आंसू आ गए।

अर्जुन की कहानी
अर्जुन ने बताया कि वह एक पुराना शिकारी था। पर अब शिकार छोड़ चुका था। कुछ साल पहले उसने जंगल के जानवरों को बचाने के लिए एक गुप्त मिशन शुरू किया था। पर कुछ लकड़हारे और तस्कर उसे पकड़ना चाहते थे, क्योंकि वह उनकी सच्चाई उजागर करना चाहता था।
“मैं झोपड़ी में छिप गया। पास में कोई नहीं रहता, इसलिए मैंने कई पत्र लिखे और जंगल में छोड़े, पर कोई जवाब नहीं आया,” अर्जुन बोला।
“आप घर क्यों नहीं गए?” राजू ने पूछा।
“मैं चाहता था कि कोई सच्चा दिलवाला बच्चा मेरी मदद करे और जानवरों को बचाने में मेरा साथ दे,” अर्जुन ने मुस्कुरा कर कहा।

सच्चाई की लड़ाई
राजू ने अर्जुन की योजना सुनी। तस्कर जंगल में नाजायज़ लकड़ियाँ काट रहे थे। उन्हें रोकने के लिए सबूत इकट्ठा करने थे।
राजू ने अगले दिन रात को अर्जुन और शेरू के साथ तस्करों की एक बैठक रिकॉर्ड की। वीडियो लेकर वह गांव लौटा और स्कूल के अध्यापक को दिखाया।
गांव वालों ने पुलिस को बुलाया। कुछ ही दिनों में तस्कर पकड़े गए। जंगल को बचा लिया गया।

नया जीवन, नई शुरुआत
अब अर्जुन जंगल छोड़कर गांव में ही रहने लगा। उसने बच्चों को जंगल के बारे में सिखाना शुरू किया — कैसे जानवरों की रक्षा करें, पेड़ न काटें और प्रकृति की सेवा करें।
राजू को उसके साहस के लिए “बाल वीर पुरस्कार” मिला। वह अब स्कूल में “जंगल सुरक्षा क्लब” चलाता है।

Moral Of The Story
सच्चा साहस उम्र नहीं देखता।
प्रकृति की रक्षा हम सबकी जिम्मेदारी है।
हर खतरे में एक मौका छिपा होता है — किसी और की मदद करने का।