एक अनकही मोहब्बत की दास्तान

भूमिका

मोहब्बत सिर्फ दो दिलों का मिलन नहीं, बल्कि वो एहसास है जो किसी को ज़िंदगी भर के लिए बदल सकता है। यह कहानी भी एक ऐसी ही मोहब्बत की दास्तान है, जो अधूरी होकर भी पूरी थी, बिछड़कर भी अमर थी।

पहला अध्याय: पहली नज़र का प्यार

अलका और आरव की पहली मुलाकात कॉलेज के पहले दिन हुई थी। अलका एक शांत, संवेदनशील और पढ़ाई में अव्वल लड़की थी, जबकि आरव एक बेपरवाह, मस्तमौला और संगीत प्रेमी युवक था। दोनों की सोच में ज़मीन-आसमान का फर्क था, लेकिन फिर भी न जाने कैसे दोनों एक-दूसरे की तरफ़ खिंचते चले गए।

कॉलेज के पहले साल में दोनों के बीच हल्की-फुल्की बातचीत होती रही, लेकिन धीरे-धीरे दोस्ती गहरी होने लगी। अलका को आरव की मासूम हंसी और उसके संगीत से लगाव पसंद था, वहीं आरव को अलका की सादगी और समझदारी ने प्रभावित कर दिया था।

दूसरा अध्याय: मोहब्बत का इज़हार

तीन साल बीत गए, और इन तीन सालों में दोनों की दोस्ती इतनी गहरी हो गई थी कि बिना कुछ कहे भी एक-दूसरे की भावनाएं समझने लगे थे। लेकिन यह रिश्ता अब दोस्ती से कहीं आगे बढ़ चुका था।

एक दिन बारिश की हल्की बूंदों के बीच, जब कॉलेज का आखिरी दिन था, आरव ने अलका को बुलाया और बिना कुछ कहे उसकी आँखों में झाँकते हुए एक गीत गुनगुनाया:

“तेरी बातों में ऐसा उलझा हूँ,
अब खुद को भी भूल गया हूँ।
तू पास रहे तो दिन खिल जाए,
तेरी यादों में मैं जी रहा हूँ…”

अलका सब समझ चुकी थी। उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन होंठों पर मुस्कान। उसने सिर्फ इतना कहा, “मुझे भी तुमसे प्यार हो गया है, आरव।”

तीसरा अध्याय: समाज की बंदिशें

मोहब्बत के इन खूबसूरत लम्हों के बाद हकीकत की दुनिया ने दस्तक दी। अलका का परिवार एक पारंपरिक परिवार था, जहाँ प्यार और प्रेम विवाह को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता था। जैसे ही घरवालों को अलका और आरव के रिश्ते के बारे में पता चला, उन्होंने अलका पर सख्त पाबंदियाँ लगा दीं।

आरव ने कई बार कोशिश की, लेकिन अलका के माता-पिता ने साफ़ शब्दों में कह दिया कि उनकी बेटी की शादी उनके तय किए हुए लड़के से ही होगी। अलका की आँखों के सामने उसका सपना टूटता जा रहा था, लेकिन वो चाहकर भी अपने माता-पिता के खिलाफ नहीं जा सकती थी।

चौथा अध्याय: जुदाई का दर्द

आखिरकार, अलका की शादी हो गई। आरव टूट चुका था, लेकिन उसने अपनी मोहब्बत को अलका की ख़ुशी के लिए कुर्बान कर दिया।

अलका की शादी के कुछ साल बाद आरव को एक मशहूर संगीतकार के रूप में पहचान मिली। उसके लिखे गीत लोगों के दिलों को छूने लगे। लेकिन वो जानता था कि उसके हर गीत में छुपी मोहब्बत सिर्फ एक ही नाम के लिए थी—अलका।

एक दिन, एक संगीत कार्यक्रम में अलका भी अपने पति के साथ मौजूद थी। जब आरव ने स्टेज पर अपना नया गीत गाया, अलका की आँखों में आँसू थे। गीत के बोल थे:

“बिछड़ के भी तुझसे जुदा रह ना पाया,
तेरी यादों में हर शाम बीताई है।
तेरी खुशियों की दुआ माँगता हूँ,
तेरी मोहब्बत मेरी रूह में समाई है…”

अलका ने महसूस किया कि मोहब्बत कभी खत्म नहीं होती। वो चाहे किसी और की हो चुकी थी, लेकिन उसकी आत्मा अब भी आरव की थी।

समाप्ति: अमर प्रेम

कई साल बीत गए, लेकिन आरव ने कभी शादी नहीं की। वह अपने गीतों के ज़रिए अलका के प्यार को ज़िंदा रखे हुए था। अलका भी अपने परिवार के साथ रहकर खुश दिखने की कोशिश करती रही, लेकिन उसकी आँखों में वो अधूरी मोहब्बत हमेशा जिंदा रही।

मोहब्बत हमेशा पाने का नाम नहीं, कभी-कभी इसे महसूस करना ही काफ़ी होता है। आरव और अलका की मोहब्बत एक ऐसी ही कहानी थी, जो अधूरी होकर भी पूरी थी।

"क्योंकि सच्ची मोहब्बत का कोई अंत नहीं होता, वो सिर्फ एक एहसास बनकर हमेशा ज़िंदा रहती है।"

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