गाँव का सपना
राजस्थान के एक छोटे से गाँव नवलगढ़ में रहता था एक 12 वर्षीय बालक — अमित। उसका परिवार बहुत ही साधारण था — माँ खेतों में काम करती और पिता एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते। अमित पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन गाँव के स्कूल की हालत बहुत ख़राब थी। वहाँ न तो ठीक से शिक्षक आते थे और न ही पुस्तकें समय पर मिलती थीं।
लेकिन अमित के सपने बड़े थे। वह हमेशा आसमान में उड़ते हवाई जहाजों को देखकर कहता, “माँ, एक दिन मैं भी पायलट बनूंगा।” माँ हँसती और कहती, “बेटा, सपना तो अच्छा है, पर ज़मीन पर पैर रखना मत भूलना।” अमित समझ जाता था कि उनके पास ज़्यादा साधन नहीं हैं, लेकिन उसका आत्मविश्वास अडिग था।

संघर्ष की शुरुआत
एक दिन गाँव के स्कूल में एक नई शिक्षिका आईं — नीलिमा मैडम। वे पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों के सपनों को भी महत्व देती थीं। जब उन्होंने अमित की कॉपी देखी, तो वह चकित रह गईं। अमित ने विज्ञान के अध्याय के चित्र इतने सुंदर बनाए थे कि लगता था जैसे किसी बड़े वैज्ञानिक ने बनाए हों।
मैडम ने उससे पूछा, “तुम्हें क्या बनना है?”
अमित ने मुस्कराते हुए कहा, “पायलट।”
मैडम ने कहा, “तो फिर तुम्हें विज्ञान और गणित दोनों में बहुत अच्छा होना होगा।”
अमित ने सिर हिलाया, “मैं पूरी कोशिश करूंगा।”
उस दिन से मैडम ने अमित को अलग से समय देना शुरू किया। स्कूल के बाद भी वह अमित को अपने घर बुलाकर पढ़ातीं। लेकिन कठिनाइयाँ तब शुरू हुईं जब अमित के पिता बीमार पड़ गए और दुकान बंद करनी पड़ी। परिवार की आर्थिक स्थिति और बिगड़ गई।

मेहनत की उड़ान
अब अमित को स्कूल के बाद खेतों में माँ की मदद करनी पड़ती थी। लेकिन वह पढ़ाई नहीं छोड़ता था। थक कर रात को जब सब सो जाते, वह लालटेन की रोशनी में पढ़ता। कई बार उसकी आँखों में नींद के आँसू होते, लेकिन उसके सपने हमेशा चमकते रहते।
गाँव में बिजली कम आती थी, इसलिए उसने खुद से एक छोटा सोलर लैंप बनाया, जिससे वह पढ़ सके। यह देखकर गाँव वाले भी चकित रह गए।
एक दिन नीलिमा मैडम ने उसे एक अख़बार में छपा एक विज्ञापन दिखाया — “नेशनल साइंस स्कॉलरशिप प्रतियोगिता”। यह प्रतियोगिता 8वीं कक्षा के बच्चों के लिए थी और इसमें जीतने पर छात्र को 3 साल तक फ्री एजुकेशन मिलती थी।
अमित ने तुरंत आवेदन किया। उसके पास इंटरनेट नहीं था, तो मैडम ने फॉर्म भरने और भेजने में मदद की।

परीक्षा और परिणाम
परीक्षा जयपुर में थी, और यह अमित की ज़िंदगी की पहली यात्रा थी। उसने कभी ट्रेन भी नहीं देखी थी। मैडम ने उसे जयपुर तक पहुँचाया। वहाँ उसे देशभर के होशियार बच्चे दिखे — सब अंग्रेज़ी में बात कर रहे थे, लैपटॉप चला रहे थे, स्मार्ट कपड़े पहने थे।
अमित थोड़ी देर के लिए घबरा गया। लेकिन फिर उसने अपनी माँ की बात याद की — “बेटा, अपने मन का डर सबसे पहले हराना।” उसने खुद को संभाला और परीक्षा दी।
कुछ हफ्तों बाद रिजल्ट आया — अमित स्कॉलरशिप में देशभर में चौथे नंबर पर आया था! पूरे गाँव में मिठाई बंटी। अब वह जयपुर के एक अच्छे बोर्डिंग स्कूल में फ्री में पढ़ाई कर सकता था।

नई दुनिया
जयपुर में अमित को नई दुनिया मिली। अंग्रेज़ी, कंप्यूटर, साइंस लैब — सब कुछ नया था। लेकिन सबसे कठिन काम था — अंग्रेज़ी बोलना। शुरू में बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते थे, लेकिन अमित ने हार नहीं मानी। उसने रोज़ एक नया शब्द सीखा, दर्पण के सामने बोलने की प्रैक्टिस की और धीरे-धीरे वह आत्मविश्वास से अंग्रेज़ी बोलने लगा।
उसने हर साल टॉप किया। 10वीं में 97% अंक आए और 12वीं में 99%। उसके विज्ञान प्रोजेक्ट को नेशनल यंग साइंटिस्ट अवार्ड मिला। इसके बाद उसने इंडियन एयर फोर्स की एनडीए परीक्षा दी — और पास हो गया।

उड़ान
अमित ने एयर फोर्स अकादमी में कड़ी ट्रेनिंग की। उसे कई बार गिराया गया, डाँटा गया, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी। उसकी आँखों में एक ही सपना था — आकाश में उड़ान भरना।
आख़िरकार वह दिन आया जब उसने पहली बार लड़ाकू विमान उड़ाया। जैसे ही विमान ने रनवे से उड़ान भरी, उसकी आँखों में आँसू थे — ख़ुशी के आँसू। उसे याद आया उसका गाँव, माँ की मेहनत, खेत, लालटेन, और नीलिमा मैडम।
वापसी
कुछ सालों बाद, अमित स्क्वाड्रन लीडर बन गया। वह एक बार छुट्टी पर गाँव लौटा। स्कूल के बच्चों से मिला और अपनी कहानी सुनाई।
उसने बच्चों से कहा:
“मैं भी तुम जैसा ही एक बच्चा था — गाँव का, गरीब, लेकिन सपने बड़े थे। अगर तुम मेहनत करोगे, अपने डर को हराओगे, और अपने अंदर विश्वास रखोगे, तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं।”
गाँव वालों की आँखें नम थीं, और स्कूल में अब एक नया नाम लिखा गया था:
“अमित सिंह विज्ञान भवन” — उस लड़के के नाम पर जिसने छोटे कदमों से बड़ी उड़ान भरी।
सीख
हालात कैसे भी हों, अगर मन में विश्वास हो तो कुछ भी संभव है।
शिक्षा ही सच्चा परिवर्तन लाने वाला माध्यम है।
असफलता डराने नहीं, सिखाने आती है।
एक अच्छे शिक्षक की भूमिका जीवन बदल सकती है।